इच्छाशक्ति
✍️ महात्मा बुद्ध
एक बार आनंद ने भगवान् बुद्ध से पूछा – “जल , वायु, अग्नि इत्यादि तत्वों में सबसे शक्तिशाली तत्व कौन सा है ” भगवान बुद्ध ने कहा – “आनंद !
पत्थर सबसे कठोर और शक्तिशाली दिखता है लेकिन लोहे का हथौडा पत्थर के टुकडे टुकड़े कर देता है, इसलिये लोहा पत्थर से अधिक शक्तिशाली है ।” “लेकिन लोहार आग की भट्टी में लोहे को गलाकर उसे मनचाही शक्ल में ढाल देता है, इसलिये आग लोहा और पत्थर से अधिक शक्तिशाली है ।” “मगर आग कितनी भी विकराल क्यों न हो, जल उसे शांत कर देता है । इसलिये जल पत्थर, लोहे, और अग्नि से अधिक शक्तिशाली है ।
लेकिन जल से भरे बादलों को वायु कहीं से कहीं उड़ाकर ले जाती है, इसलिये वायु, जल से भी अधिक बलशाली है ।” "लेकिन हे आनंद ! इच्छाशक्ति वायु की दिशा को भी मोड सकती है । इसलिये सबसे अधिक शक्तिशाली तत्व है – व्यक्ति की इच्छाशक्ति । इच्छाशक्ति से अधिक बलशाली तत्व कोई नहीं है, यदि किसी काम को अपनी इच्छा से किया जाये तो सफलता जरुर मिलती है।
बुद्धि का बल विश्व के महानतम दार्शनिकों में से एक सुकरात एक बार अपने शिष्यों के साथ बैठे कुछ चर्चा कर रहे थे। तभी वहां एक ज्योतिषी आ पहुंचा। वह सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए बोला, “मैं ज्ञानी हूँ ,मैं किसी का चेहरा देखकर उसका चरित्र बता सकता हूँ। बताओ तुममें से कौन मेरी इस विद्या को परखना चाहेगा?” सभी शिष्य सुकरात की तरफ देखने लगे। सुकरात ने उस ज्योतिषी से अपने बारे में बताने के लिए कहा।
अब वह ज्योतिषी उन्हें ध्यान से देखने लगा। सुकरात बहुत बड़े ज्ञानी तो थे लेकिन देखने में बड़े सामान्य थे, बल्कि उन्हें कुरूप कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी। ज्योतिषी उन्हें कुछ देर निहारने के बाद बोला, “तुम्हारे चेहरे की बनावट बताती है कि तुम सत्ता के विरोधी हो, तुम्हारे अंदर द्रोह करने की भावना प्रबल है।
तुम्हारी आँखों के बीच पड़ी सिकुड़न तुम्हारे अत्यंत क्रोधी होने का प्रमाण देती है ….” ज्योतिषी ने अभी इतना ही कहा था कि वहां बैठे शिष्य अपने गुरु के बारे में ये बातें सुनकर गुस्से में आ गए और उस ज्योतिषी को तुरंत वहां से जाने के लिए कहा। पर सुकरात ने उन्हें शांत करते हुए ज्योतिषी को अपनी बात पूर्ण करने के लिए कहा।
ज्योतिषी बोला, “तुम्हारे बेडौल सिर और माथे से पता चलता है कि तुम लालची हो, और तुम्हारी ठुड्डी की बनावट तुम्हारे सनकी होने के तरफ इशारा करती है।” इतना सुनकर शिष्य और भी क्रोधित हो गए पर इसके उलट सुकरात प्रसन्न हो गए और ज्योतिषी को इनाम देकर विदा किया।
शिष्य सुकरात के इस व्यवहार से आश्चर्य में पड़ गए और उनसे पूछा, “गुरूजी, आपने उस ज्योतिषी को इनाम क्यों दिया, जबकि उसने जो कुछ भी कहा वो सब गलत है ?” “नहीं पुत्रो, ज्योतिषी ने जो कुछ भी कहा वो सब सच है, उसके बताये सारे दोष मुझमें हैं, मुझे लालच है, क्रोध है, और उसने जो कुछ भी कहा वो सब है, पर वह एक बहुत ज़रूरी बात बताना भूल गया, उसने सिर्फ बाहरी चीजें देखीं पर मेरे अंदर के विवेक को नही आंक पाया, जिसके बल पर मैं इन सारी बुराइयों को अपने वश में किये रहता हूँ, बस वह यहीं चूक गया, वह मेरे बुद्धि के बल को नहीं समझ पाया !” सुकरात ने अपनी बात पूर्ण की।
सफलता का रहस्य सफलता का रहस्य क्या है? जब यह प्रश्न एक युवक ने युनान के प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात से किया तो इस प्रश्न के उत्तर में सुकरात ने उस युवक को कल सुबह नदी किनारे मिलने के लिए कहा। अगले दिन सुबह के समय वह युवक और सुकरात दोनों नदी किनारे पहुंच गए। सुकरात ने नौजवान युवक से उनके साथ पानी में आगे बढ़ने को कहा। युवक सुकरात के साथ नदी में पानी की ओर बढ़ता चला गया।
जब आगे बढ़ते- बढ़ते पानी गले तक आ गया। तब अचानक सुकरात ने उस युवक का सिर पानी में डुबो दिया। नौजवान युवक अपना सिर बाहर निकालने के लिए छटपटाने लगा। सुकरात ताकतवर थे इसलिए युवक का पानी से बाहर निकलने का हर प्रयास विफल होता जा रहा था। जब शरीर नीला पड़ने लगा तब जाकर सुकरात ने उस युवक का सिर पानी से बाहर निकाला और बाहर निकलते ही जो काम नौजवान ने सबसे पहले किया वो था हाँफते हुए जल्दी-जल्दी सांस लेना।
सुकरात ने उस युवक से पूछा -जब तुम्हारा सिर पानी के भीतर था तब तुम सबसे ज्यादा क्या चाहते थे। नौजवान युवक ने उत्तर दिया - सांस लेना। सुकरात ने कहा - बस, यही सफलता का रहस्य है। जब तुम सफलता को उतना ही ज्यादा चाहोगे जितना कि तुम उस वक्त सांस लेना चाहते थे तो वो तुम्हें जरूर मिल जाएगी। सुकरात और आईना दार्शनिक सुकरात दिखने में कुरुप थे। वह एक दिन अकेले बैठे हुए आईना हाथ मे लिए अपना चेहरा देख रहे थे।
तभी उनका एक शिष्य कमरे मे आया ; सुकरात को आईना देखते हुए देख उसे कुछ अजीब लगा । वह कुछ बोला नही सिर्फ मुस्कराने लगा। विद्वान सुकरात शिष्य की मुस्कराहट देख कर सब समझ गए और कुछ देर बाद बोले, “मैं तुम्हारे मुस्कराने का मतलब समझ रहा हूँ…….शायद तुम सोच रहे हो कि मुझ जैसा कुरुप आदमी आईना क्यों देख रहा है ?” शिष्य कुछ नहीं बोला, उसका सिर शर्म से झुक गया।
सुकरात ने फिर बोलना शुरु किया, “शायद तुम नहीं जानते कि मैं आईना क्यों देखता हूँ” “नहीं”, शिष्य बोला । गुरु जी ने कहा “मैं कुरूप हूं इसलिए रोजाना आईना देखता हूं”। आईना देख कर मुझे अपनी कुरुपता का भान हो जाता है। मैं अपने रूप को जानता हूं। इसलिए मैं हर रोज कोशिश करता हूं कि अच्छे काम करुं ताकि मेरी यह कुरुपता ढक जाए।” शिष्य को ये बहुत शिक्षाप्रद लगी ।
परंतु उसने एक शंका प्रकट की- “तब गुरू जी, इस तर्क के अनुसार सुंदर लोगों को तो आईना नही देखना चाहिए ?” “ऐसी बात नही!” सुकरात समझाते हुए बोले ,“उन्हे भी आईना अवश्य देखना चाहिए”! इसलिए ताकि उन्हे ध्यान रहे कि वे जितने सुंदर दीखते हैं उतने ही सुंदर काम करें, कहीं बुरे काम उनकी सुंदरता को ढक ना लें और परिणामवश उन्हें कुरूप ना बना दें । शिष्य को गुरु जी की बात का रहस्य मालूम हो गया।
वह गुरु के आगे नतमस्तक हो गया। 1 एक था तोता । वह बड़ा मूर्ख था। गाता तो था, पर शास्त्र नही पढ़ता था । उछलता था, फुदकता था, उडता था, पर यह नहीं जानता था कि क़ायदा-क़ानून किसे कहते हैं । राजा बोले, ''ऐसा तोता किस काम का? इससे लाभ तो कोई नहीं, हानि जरूर है ।
जंगल के फल खा जाता है, जिससे राजा-मण्डी के फल-ब़ाजार में टोटा पड़ जाता है ।'' मंत्री को बुलाकर कहा, ''इस तोते को शिक्षा दो!'' 2 तोते को शिक्षा देने का काम राजा के भानजे को मिला । पण्डितों की बैठक हुई । विषय था, ''उक्त जीव की अविद्या का कारण क्या है?'' बड़ा गहरा विचार हुआ । सिद्धान्त ठहरा : तोता अपना घोंसला साधारण खर-पात से बनाता है । ऐसे आवास में विद्या नहीं आती ।
इसलिए सबसे पहले तो यह आवश्यक है कि इसके लिए कोई बढ़िया-सा पिंजरा बना दिया जाय । राज-पण्डितों को दक्षिणा मिली और वे प्रसन्न होकर अपने-अपने घर गये । 3 सुनार बुलाया गया । वह सोने का पिंजरा तैयार करने में जुट पड़ा । पिंजरा ऐसा अनोखा बना कि उसे देखने के लिए देश-विदेश के लोग टूट पडे । कोई कहता, ''शिक्षा की तो इति हो गयी ।'' कोई कहता, ''शिक्षा न भी हो तो क्या, पिंजरा तो बना ।
इस तोते का भी क्या नसीब है!'' सुनार को थैलियाँ भर-भरकर इनाम मिला । वह उसी घड़ी अपने घर की ओर रवाना हो गया । पण्डितजी तोते को विद्या पढ़ाने बैठे । नस लेकर बोले, ''यह काम थोड़ी पोथियों का नहीं है ।'' राजा के भानजे ने सुना । उन्होंने उसी समय पोथी लिखनेवालों को बुलवाया । पोथियों की नकल होने लगी । नक़लों के और नक़लों की नक़लों के पहाड़ लग गये । जिसने, भी देखा, उसने यही कहा कि, ''शाबाश!
इतनी विद्या के धरने को जगह भी नहीं रहेगी!'' नक़लनवीसों को लद्दू बैलों पर लाद-लादकर इनाम दिये गए । वे अपने-अपने घर की ओर दौड़ पड़े । उनकी दुनिया में तंगी का नाम-निशान भी बाकी न रहा । दामी पिंजरे की देख-रेख में राजा के भानजे बहुत व्यस्त रहने लगे । इतने व्यस्त कि व्यस्तता की कोई सीमा न रही । मरम्मत के काम भी लगे ही रहते । फिर झाडू-पोंछ और पालिश की धूम भी मची ही रहती थी ।
जो ही देखता, यही कहता कि ''उन्नति हो रही है।'' इन कामों पर अनेक-अनेक लोग लगाये गये और उनके कामों की देख-रेख करने पर और भी अनेक-अनेक लोग लगे । सब महीने-महीने मोटे-मोटे वेतन ले-लेकर बड़े-बड़े सन्दूक भरने लगे । वे और उनके चचेरे-ममेरे-मौसेरे भाई-बंद बड़े प्रसन्न हुए और बड़े-बड़े कोठों-बालाखानों में मोटे-मोटे गद्दे बिछाकर बैठ गये । 4 संसार में और-और अभाव तो अनेक हैं, पर निन्दकों की कोई कमी नहीं है।
एक ढूँढो हजार मिलते हैं । वे बोले, ''पिंजरे की तो उन्नति हो रही है, पर तोते की खोज-खबर लेने वाला कोई नहीं है! बात राजा के कानों में पड़ी । उन्होंने भानजे को बुलाया और कहा, ''क्यों भानजे साहब, यह कैसी बात सुनाई पड़ रही है?
'' भानजे ने कहा, ''महाराज, अगर सच-सच बात सुनना चाहते हों तो सुनारों को बुलाइये, पण्डितों को बुलाइये, नक़लनवीसों को बुलाइये, मरम्मत करनेवालों को और मरम्मत की देखभाल करने वालों को बुलाइये । निन्दकों को हलवे-मॉड़े मे हिस्सा नहीं मिलता, इसीलिए वे ऐसी ओछी बात करते हैं ।'' जवाब सुनकर राजा नें पूरे मामले को भली-भाँति और साफ-साफ तौर से समझ लिया । भानजे के गले में तत्काल सोने के हार पहनाये गये ।
5 राजा का मन हुआ कि एक बार चलकर अपनी आँखों से यह देखें कि शिक्षा कैसे धूमधड़ाके से और कैसी बगटुट तेज़ी के साथ चल रही है । सो, एक दिन वह अपने मुसाहबों, मुँहलगों, मित्रों और मन्त्रियों के साथ आप ही शिक्षा-शाला में आ धमके । उनके पहुँचते ही ड्योढ़ी के पास शंख, घड़ियाल, ढोल, तासे, खुरदक, नगाड़े, तुरहियाँ, भेरियाँ, दमामें, काँसे, बाँसुरिया, झाल, करताल, मृदंग, जगझम्प आदि-आदि आप ही आप बज उठे ।
पण्डित गले फाड़-फाड़कर और बूटियां फड़का-फड़काकर मन्त्र-पाठ करने लगे । मिस्त्री, मजदूर, सुनार, नक़लनवीस, देख-भाल करने वाले और उन सभी के ममेरे, फुफेरे, चचेरे, मौसेरे भाई जय-जयकार करने लगे । भानजा बोला, ''महाराज, देख रहे हैं न?'' महाराज ने कहा, ''आश्चर्य! शब्द तो कोई कम नहीं हो रहा! भानजा बोला, ''शब्द ही क्यों, इसके पीछे अर्थ भी कोई कम नहीं!'' राजा प्रसन्न होकर लौट पड़े ।
ड्योड़ी को पार करके हाथी पर सवार होने ही वाले थे कि पासके झुरमुट में छिपा बैठा निन्दक बोल उठा, ''महाराज आपने तोते को देखा भी है?'' राजा चौंके। बोले, ''अरे हाँ! यह तो मैं बिलकुल भूल ही गया था! तोते को तो देखा ही नहीं! '' लौटकर पण्डित से बोले, ''मुझे यह देखना है कि तोते को तुम पढ़ाते किस ढंग से हो ।'' पढ़ाने का ढंग उन्हें दिखाया गया । देखकर उनकी खुशी का ठिकाना न रहा ।
पढ़ाने का ढंग तोते की तुलना में इतना बड़ा था कि तोता दिखाई ही नहीं पड़ता था । राजा ने सोचा : अब तोते को देखने की जरूरत ही क्या है? उसे देखे बिना भी काम चल सकता है! राजा ने इतना तो अच्छी तरह समझ लिया कि बंदोबस्त में कहीं कोई भूल-चूक नहीं है । पिंजरे में दाना-पानी तो नही था, थी सिर्फ शिक्षा । यानी ढेर की ढेर पोथियों के ढेर के ढेर पन्ने फाड़-फाड़कर कलम की नोंक से तोते के मुँह में घुसेड़े जाते थे ।
गाना तो बन्द हो ही गया था, चीरने-चिल्लाने के लिए भी कोई गुंजायश नही छोड़ी गयी थी । तोते का मुँह ठसाठस भरकर बिलकुल बन्द हो गया था । देखनेवाले के रोंगटे खड़े हो जाते । अब दुबारा जब राजा हाथी पर चढ़ने लगे तो उन्होंने कान-उमेठू सरदार को ताकीद कर दी कि ''निन्दक के कान अच्छी तरह उमेठ देना!'' 6 तोता दिन पर दिन भद्र रीति के अनुसार अधमरा होता गया। अभिभावकों ने समझा कि प्रगति काफी आशाजनक हो रही है ।
फिर भी पक्षी-स्वभाव के एक स्वाभाविक दोष से तोते का पिंड अब भी छूट नहीं पाया था । सुबह होते ही वह उजाले की ओर टुकुर-टुकुर निहारने लगता था और बड़ी ही अन्याय-भरी रीति से अपने डैने फड़फड़ाने लगता था । इतना ही नहीं, किसी-किसी दिन तो ऐसा भी देखा गया कि वह अपनी रोगी चोंचों से पिंजरे की सलाखें काटने में जुटा हुआ है । कोतवाल गरजा, ''यह कैसी बेअदबी है !'' फौरन लुहार हाजिर हुआ । आग, भाथी और हथौडा लेकर ।
वह धम्माधम्म लोहा-पिटाई हुई कि कुछ न पूछिये! लोहे की सांकल तैयार की गई और तोते के डैने भी काट दिये गए । राजा के सम्बन्धियों ने हाँड़ी-जैसे मुँह लटका कर और सिर हिलाकर कहा, ''इस राज्य के पक्षी सिर्फ बेवकूफ ही नही, नमक- हराम भी हैं ।'' और तब, पण्डितों ने एक हाथ में कलम और दूसरे हाथ मे बरछा ले-लेकर वह कांड रचाया, जिसे शिक्षा कहते हैं ।
लुहार की लुहसार बेहद फैल गयी और लुहारिन के अंगों पर सोने के गहनें शोभने लगे और कोतवाल की चतुराई देखकर राजा ने उसे सिरोपा अता किया । 7 तोता मर गया । कब मरा, इसका निश्चय कोई भी नहीं कर सकता । कमबख्त निन्दक ने अफवाह फैलायी कि ''तोता मर गया! '' राजा ने भानजे को बुलवाया और कहा, ''भानजे साहब यह कैसी बात सुनी जा रही है?
'' भानजे ने कहा, ''महाराज, तोते की शिक्षा पूरी हो गई है!" राजा ने पूछा, ''अब भी वह उछलता-फुदकता है? '' भानजा बोला, अजी, राम कहिये! '' 8 ''अब भी उड़ता है?'' ''ना:, क़तई नहीं!'' ''अब भी गाता है?'' ''नहीं तो! '' ''दाना न मिलने पर अब भी चिल्लाता है?'' "ना!" राजा ने कहा, ''एक बार तोते को लाना तो सही, देखूंगा जरा! तोता लाया गया । साथ में कोतवाल आये, प्यादे आये, घुड़सवार आये!
राजा ने तोते को चुटकी से दबाया । तोते ने न हाँ की, न हूँ की । हाँ, उसके पेट में पोथियों के सूखे पत्ते खड़खड़ाने जरूर लगे । बाहर नव-वसन्त की दक्षिणी बयार में नव-पल्लवों ने अपने निश्वासों से मुकुलित वन के आकाश को आकुल कर दिया ।
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स्रोत/लेखक: महात्मा बुद्ध