📖 कहानीबाबू

हम सब चोर हैं (बोध कथा)

✍️ यशपाल जैन

पुराने जमाने की बात है। एक आदमी को अपराध में पकड़ा गया। उसे राजा के सामने पेश किया गया। उन दिनों चोरो को फांसी की सजा दी जाती थी। अपराध सिद्ध हो जाने पर इस आदमी को भी फांसी की सजा मिली। राजा ने कहा, "फांसी पर चढ़ने से पहले तुम्हारी कोई इच्छा हो तो बताओ।" आदमी ने कहा, "राजन्! मैं मोती तैयार करना जानता हूं।

मेरी इच्छा है कि मरने से पहले कुछ मोती तैयार कर जाऊं।" राजा ने उसकी बात मान ली और उसे कुछ दिन के लिए छोड़ दिया। आदमी ने महल के पास एक खेत की जमीन को अच्छी तरह खोदा और समतल किया। राजा और उसके अधिकारी वहां मौजूद थे। खेत ठीक होने पर उसने राजा से कहा, "महाराज, मोती बोने के लिए जमीन तैयार है, लेकिन इसमें बीज वही डाल सकेगा, जिसने तन से या मन से कभी चोरी न क हो।

मैं तो चोर हूं, इसलिए बीज डाल नहीं सकता।" राजा ने अपने अधिकारियों की ओर देखा। कोई भी उठकर नहीं आया। तब राजा ने कहा, "मैं तुम्हारी सजा माफ करता हूं। हम सब चोर हैं। चोर चोर को क्या दण्ड देगा!"

‹ धीरज का फल (बोध कथा)नशे का तमाशा (बोध कथा) ›

ये कहानियाँ भी पढ़ें