दान का आनंद (बोध कथा)
✍️ यशपाल जैन
एक राजा थे। वह बड़े ही उदार थे। दानी तो इतने कि खाने-पीने की जो भी चीज होती, अक्सर भूखों को बांट देते और स्वयं पानी पीकर रह जाते। एक बार ऐसा संयोग हुआ कि उन्हें कई दिनों तक भोजन न मिला। उसके बाद मिला तो थाल भरकर मिला। उसमें से भूखों को बांटकर जो बचा, उसे खाने बैठे कि एक ब्राह्मण आ गया। वह बोला, "महाराज! मुझे कुछ दीजिये।" राजा ने थाल में से थोड़ी-थोड़ी चीजें उठाकर उसे दे दीं।
फिर जैसे ही खाने को हुए कि एक शूद्र आ गया। राजा ने खुशी-खुशी उसे भी कुछ दे दिया। उसके जाते ही एक चाण्डाल आ गया। राजा ने बचा-बचाया सब उसे दे दिया। मन-ही-मन सोचा, कितना अच्छा हुआ, जो इतनों का काम चला! मेरा क्या है, पानी पीकर मजे में अपनी गुजर कर लूंगा। इतना कहकर वह जैसे ही पानी पीने लगे कि हांफता हुआ एक कुत्ता वहॉँ आ गया। गर्मी से वह बेहाल हो रहा था। राजा ने झट पानी का बर्तन उठाकर उसके सामने रख दिया।
कुत्ता सारा पानी पी गया। राजा को न खाना मिला, न पानी, पर उसे जो मिला उसका मूल्य कौन आंक सकता है!
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स्रोत/लेखक: यशपाल जैन