📖 कहानीबाबू

पच्चीसवीं पुतली

📚 सिंहासन बत्तीसी

पच्चीसवीं पुतली त्रिनेत्री ने कहना आरम्भ किया: एक गरीब भाट था। उसकी कन्या ब्याह के योग्य हुई तो उसने सारी दुनिया के राजाओं के यहां चक्कर लगाये, लेकिन किसी ने भी उसे एक कौड़ी न दी। तब वह राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचा और उसे सब हाल कह सुनाया। राजा ने तुरंत उसे दस लाख रुपये और हीरे, लाल, मोती और सोने-चांदी के गहने थाल भर-भरकर दिये। ब्राह्मण ने सब कुछ ब्याह में खर्च कर डाला।

खाने को भी अपने पास कुछ न रक्खा। पुतली बोली: इतने दानी हो तो सिंहासन पर बैठो। राजा की हैरानी बहुत बढ़ गई। रोज कोई-न-कोई बाधा पड़ जाती थी। अगले दिन उसे छब्बीसवीं पुतली ने रोका और बोली, "पहले विक्रमादित्य की तरह यश कमाओ, तब सिंहासन पर बैठना।" इतना कहकर उसने सुनाया।

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