📖 कहानीबाबू

समान वितरण व्यवस्था

📚 गोनू झा की कहानियाँ

एक दिन मिथिला नरेश के दरबार में एक साधु आया । नरेश ने उनकी आवभगत की । श्रद्धा से कर जोड़े। आशीष ग्रहण किया । साधु ने बताया कि वह चारों धाम का भ्रमण करके लौटा है । मिथिला में अपने यजमानों को प्रसाद बाँटता हुआ महाराज के पास उन्हें और उनके दरबारियों को प्रसाद देने की इच्छा से वह वहाँ आया है। प्रसाद वितरण तक ही वह वहाँ रुकेगा, उसके बाद विदा हो जाएगा ।

साधु ने महाराज को अपनी थैली से निकालकर चार बताशे दिए और कहा -" राजन्! ये चार बताशे, चारों धाम के प्रसाद हैं । इनका समान वितरण यहाँ दरबारियों के बीच होना चाहिए । हाँ, ध्यान रहे कि प्रसाद सबसे पहले आप ही ग्रहण करेंगे। महाराज विस्मित भाव से अपनी तलहथी पर पड़े चार बतासों को थोड़ी देर तक देखते रहे फिर उन्होंने अपने दरबारियों की तरफ देखा ।

उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि इन चार बताशों का सभी दरबारियों के बीच समान वितरण कैसे हो सकता है ? अन्ततः उन्होंने एक वृद्ध दरबारी को बुलाकर चारों बताशे दिए और बोले -" आप बुजुर्ग हैं । आप ही इन बताशों का समान विवरण करें ।" वह दरबारी कुछ कह नहीं पाया । उसकी भी स्थिति महाराज जैसी ही थी ।

जिस तरह महाराज की समझ में कुछ नहीं आया था, उसी तरह इस वृद्ध दरबारी की समझ में कुछ नहीं आया कि आखिर कैसे इन चार बताशों को सभी दरबारियों के बीच बराबर -बराबर बाँटा जाए ? थोड़ी देर मौन रहने के बाद साहस करके उस वृद्ध दरबारी ने महाराज से कहा -" महाराज ! मुझे ऐसी युक्ति स्मरण नहीं जिससे इन चार बताशों को सभी दरबारियों में बराबर- बराबर बाँटा जा सके।

महाराज, मुझे क्षमा करें और यह कार्य किसी अन्य को सौंप दें ।" महाराज ने कई दरबारियों को बुलाया लेकिन उनमें से कोई भी दरबारी इस काम के लिए राजी नहीं हुआ । दरबार में बैठा काना नाई, जो गोनू झा से बैर भाव रखता था, हठात् अपने आसन से उठा और महाराज से कहने लगा -"महाराज ! यह कार्य इस दरबार में केवल एक ही व्यक्ति कर सकता है-वह और कोई नहीं, हमारे दरबार के सबसे गुणी व्यक्ति गोनू झा जी हैं ।

आप यह कार्य उन्हें सौंपे... फिर कोई समस्या नहीं रहेगी।" महाराज काना नाई की कुटिलता भाँप गए। गोनू झा ने भी समझ लिया कि काना नाई ने इस कार्य को असम्भव मानकर उन्हें नीचा दिखाने के लिए उनके नाम का प्रस्ताव किया है । इस बात को भांपते ही गोनू झा के होंठों पर मुस्कान तैर गई ।

महाराज ने गोनू झा की तरफ देखा ही था कि गोनू झा अपने आसन से उठ गए और मुस्कुराते हुए बोले-“जी हाँ, महाराज मैं इस प्रसाद का सभी दरबारियों में समान वितरण करूँगा। आप आदेश दें ।" महाराज ने उन्हें बुलाकर बताशे दे दिए । गोनू झा ने श्रद्धापूर्वक अपनी 'अँजुरी' में बताशे लिए और महाराज से विनीत स्वरों में बोले-“महाराज !

कृपा कर एक ‘माठ' (मिट्टी का बड़ा घड़ा ) जल, दरबार में उपस्थित लोगों की गणना के बराबर मिट्टी के कुल्हड़, एक बोतल गुलाब जल और एक पसेरी चीनी की व्यवस्था यथाशीघ्र करवा दें ।" गोनू झा की माँग तत्काल पूरी करने का निर्देश महाराज ने दे दिया । थोड़ी ही देर में सारी वस्तुएँ दरबार में आ गईं । गोनू झा ने चीनी पानी से भरे माठ में डाल दिया । फिर उसमें गुलाब जल की बोतल खोलकर सारा गुलाब जल उड़ेल दिया ।

फिर उन्होंने एक करछुल की माँग की । करछुल भी आया । एक आदमी को गोनू झा ने माठ के पानी में डाले गए चीनी को हिलाकर पानी में घुलाने का निर्देश दिया । दरबारीगण आँखें फाड़े सारी गतिविधियाँ देख रहे थे। किसी की भी समझ में नहीं आ रहा था कि गोनू झा आखिर करना क्या चाहते हैं । थोड़ी देर तक दरबारियों की विस्मित निगाहों का गोनू झा आनन्द उठाते रहे ।

अन्त में उन्होंने अपने हाथ से चारों बताशे को एक-एक कर पानी में डाल दिया और ऊँची आवाज में बोले – “महाराज ! अब यह पूरा माठ बताशे के शर्बत से भरा हुआ है और शर्बत, केवल शर्बत न माना जाए। यह चारों धाम का प्रसाद है। “ अपने दोनों हाथों में एक-एक कुल्हड़ शर्बत लेकर गोनू झा महाराज के पास आए और बोले -"साधु महाराज की आज्ञा के अनुसार सबसे पहले प्रसाद आप ग्रहण करें ।

“ दूसरा कुल्हड़ उन्होंने साधु की ओर बढ़ाया और बोले -"आप इस राज्य के शुभ की कामना रखते हैं तभी महाराज को प्रसाद देने के लिए पधारे। आप हमारे अतिथि हैं-देवता समान। इसलिए यह प्रसाद आप भी ग्रहण करें ।" इसके बाद समस्त दरबारियों में कुल्हड़ में शर्बत बाँटा गया । गोनू झा ने भी शर्बत पीया । अभी शर्बत पीने -पिलाने का दौर चल ही रहा था कि साधु अपने आसन से उठ खड़ा हुआ और बोला-“राजन!

जिस राज्य में ऐसा गुणी आदमी मौजूद है उस राज्य में हमेशा श्रीवृद्धि होती रहेगी ।" साधु आशीष देता हुआ वहाँ से चला गया । दरबारी मुक्त कंठ से गोनू झा की प्रशंसा कर रहे थे और काना नाई जल- भुनकर खाक हुआ जा रहा था । गोनू झा और सच्ची गप्प (कहानी) बात उन दिनों की है जब गोनू झा राजदरबार में नियुक्त नहीं हुए थे। तब वह गांव में खेती-बाड़ी करते थे और उनकी आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं थी।

वह अपनी बुद्धि के प्रयोग से ही सारा काम करते थे। जैसे-तैसे घर-गृहस्थी का पालन-पोषण होता था। उनके गांव में भी हीरन और फीरन नाम के दो ठग थे। वे दोनों अधिक मशहूर तो नहीं थे पर दांव पड़ने पर वह किसी को भी चूना लगा देते थे। अधिकतर लोग तो उनसे बात करने से भी परहेज रखते थे पर कई बार कोई न कोई फंस ही जाता था। एक बार गोनू झा को कुछ पैसे की आवश्यकता हुई तो वह घर से धान लेकर बाजार गए।

धान बेचकर उन्हें एक सौ बीस रुपए मिले। उन्हें सौ रुपए की आवश्यकता थी तो बीस रुपया उन्होंने खर्च कर लेने का विचार किया। सब जानते हैं कि गोनू झा मिठाई के कितने शौकीन थे। जब वह मिठाई खाते तो भरपेट खाते थे। आज भी उन्होने इसी विचार से तीन सेर मिठाई तौलकर ले ली। अभी वह मुड़े ही थे कि सामने हीरन-फीरन खड़े थे। "प्रणाम पंडित जी!" दोनों ने कहा-"आज तो पैसे का सहारा लगता है।" है तो सही।

धान बेचकर आया हूं।" "अच्छा! गांव चल रहे हैं। हम बैलगाड़ी से आए हैं। आप भी बैठकर चल पड़े। रास्ते में बातें करते चलेंगे।" "और मिठाई भी खा लेंगे।" 'मिठाई तो खा लेना। पर यह तो बताओ कि तुम दोनों बैलगाड़ी लेकर बाजार में क्यों आए थे।" गोनू झा ने पूछा। "अब आपसे क्या छुपाना पंडित जी।" हीरन ने कहा-"रात भर खेतों से धान की बालें बीन-बीनकर दो महीने में दो बोरी धान इकट्ठे किए थे।

आज उन्हें बेचकर आ रहे हैं।" "अच्छा! चलो तो अब चलते हैं।" तीनों जने बैलगाड़ी में बैठ गए। गोनू झा खुले दिल के आदमी थे। मिठाई खोलकर रख दी तो हीरन-फीरन जुट गए। गोनू झा ने भी अपना सारा अनुभव झोंक दिया कि ज्यादा से ज्यादा मिठाई खा सकें। मिठाई खत्म हुई तो बैलगाड़ी चल पड़ी। 'पंडित जी, आप तो बहुत बुद्धिमान हैं।

कोई ऎसा काम बताएं जिससे हम दोनों भी चैन से गुजर कर सकें।" "भई, परिश्रम से कमाया धन ही अधिक चैन देता है।" "अब परिश्रम तो हमसे कहां होता है पंडित जी। हम ठहरे उठाईगिरे!" 'तो फिर भैया चैन की बात क्यों करते हो। जैसी कट रही है, कटने दो।' "पंडित जी, मुझे तो एक बात सूझ रही है।" फीरन बोला। 'तुम भी कहो।" देखिए, अभी गांव तो हमारा दूर है। बैल भी बेचारे सुबह के भूखे हैं और धीरे-धीरे चल रहे हैं।

रास्ता लम्बा हो जाएगा। अब इस तरह तो समय कटेगा नहीं। क्यों न हम समय बिताने के लिए कुछ गप्प हांक लें। गप्प हांकने में तो गोनू झा बड़े ही माहिर थे। 'ठीक है भाई! मुझे क्या परेशानी हो सकती है।" "तो शुरुआत हीरन ही करेगा।' "वो तो ठीक है पर खाली गप्प हांकने से भी तो कोई लाभ नहीं। क्यों न हम कोई शर्त रख लें।" गोनू झा ने प्रस्ताव रखा। "शर्त! पंडित जी आपसे शर्त रखने में हमें भय लगता है।" "भय कैसा!

पहले शर्त तो सुन लो। यदि भयभीत करने वाली शर्त हो तो मत रखना। कोई जोर-जबरदस्ती थोड़े ही है।' "ठीक है। तो सुनाइए अपनी शर्त!" "देखो, हम गप्पें सुनाएंगे। जैसा कि तुम जानते हो कि गप्प तो गप्प होती है। सच से उसका कोई लेना-देना नहीं होता। पर हममें से कोई एक-दूसरे की गप्प को झूठी नहीं बताएगा। जो ऎसा करेगा, उसे सौ रुपया हर्जाना देना होगा।" दोनों ने विचार किया कि इस शर्त में तो कोई हानि नहीं है।

उन्हें क्या जरूरत है गोनू झा की गप्प को झूठी बताने की। "ठीक है पंडित जी, हमें मंजूर है।" "तो फिर शुरू करो फीरन।" फीरन ने कुछ देर सोचा और अपनी गप्प तैयार कर ली। 'सुनो जी, बात उन दिनों की है जब मेरे परदादा होते थे। कहते हैं कि मेरे परदादा के पास इतनी बड़ी चारपाई थी कि उस पर सारा गांव चैन से सो सकता था।

गांव में जितनी भी बारातें आती थीं मेरे दादा की अकेली चारपाई पर ही सो जाती थीं।" "भई!" गोनू झा ने कहा-"यह तो मैंने भी सुना था। यहां तक कि यह भी कहा जाता है कि उस चारपाई को बुनने में दस मन रस्सी लगती थी।" "और मैंने तो यह भी सुना है कि फीरन के परदादा की चारपाई को बुनने वाले मेरे परदादा थे।" हीरन ने भी गप्प की पुष्टि की-"और वह बीस दिन में उस चारपाई को बुन देते थे।" फीरन की गप्प तो खत्म हो गई।

उसकी पुष्टि भी हो गई। दोनों श्रोता में से किसी ने भी उसे झूठी नहीं कहा था। अब हीरन की बारी थी। "अब तुम बोलो हीरन भाई।" गोनू झा ने कहा। 'मैं भी अपने परदादा के बारे में ही गप्प हांकूंगा।" हीरन ने कहा-"बात तब की है जब सूत काता जाता था।

मेरे परदादा ने एक रात में बाइस मन सूत कातकर उसका एक कम्बल बुना था और जब सर्दियां आई तो फीरन के परदादा की चारपाई पर सारा गांव उसी कम्बल में ढककर सोता था।" "बिल्कुल ठीक।" गोनू झा ने कहा-"मेरे परदादा बताते थे कि उस कम्बल का कुछ हिस्सा फिर भी बाकी बच जाता था तो उसमें पशु बांधकर ढक दिए जाते थे।

ग्यारह भैंसे तो हमारी ही बंधती थी।" "हां।" फीरन ने भी पुष्टि की-"बताया जाता है कि उस कम्बल में इतनी गर्मी लगती थी कि मेरे परदादा की जेब में रखी भांग की चिलम सुलग गई थी। बड़ी मुश्किल से जान बची सबकी।' हीरन की भी गप्प पुष्टि के साथ समाप्त हुई। "अब आपकी बारी है पंडित जी।" 'सुनो भई! बात मैं भी परदादा की ही कहूंगा। इतना तो तुमने सुना ही होगा कि मेरे परदादा एक बहुत लम्बे-चौड़े आदमी थे।' 'सुना है।

क्यों नहीं सुना। हमारे बुजुर्ग बताते थे।' दोनों ने हामी भरी। "पर यह नहीं पता होगा कि वे थे कितने लम्बे-चौड़े। वह एक डग में भरौरा से मिथिला पहुंच जाते थे। घर बैठे हाथ बढाकर जंगल से लकड़ियां तोड़ते रहते थे। फीरन के दादा की चारपाई की रस्सी को उन्होंने दो बार में नाप दिया था। हीरन के परदादा के कम्बल को वही धूप में उठाकर सुखाते थे और तह करके रखते थे।" 'हां जी।

यह बात बिल्कुल सत्य है।" 'तो यह भी सत्य है कि उनकी खोपड़ी का आकार बीस बीघा खेत के बराबर था, जिस पर एक भी बाल नहीं उगता था।' "हां हां। यह भी हमने सुना है।" दोनो ने फिर पुष्टि की। "तो भैया, फिर तो वह भी सुना होगा जब भीषण अकाल पड़ा था और खाने के लाले पड़ गए थे। तब मेरे दादा कलकत्ते से नवाब के यहां से पचास मन धान उधार लाए थे अपने सिर पर रखकर।

तब वह धान गांव के लोगों में इस शर्त पर बांटा गया कि सब लोग समय पर नवाब का धान चुकाएंगे। बताओ, यही बात थी न! गोनू झा ने पूछा। 'बिल्कुल सही। यही तय हुआ था।" 'सबके घर नवाब का धान गया। दो-दो मन धान सबने लिया। तुम्हारे परदादा ने तो कम्बल पर सुखाया था। बताया होगा तुम्हें।' 'बताया था। आज तक याद है।" 'और तेरे परदादा ने चारपाई के नीचे आधी धूप आधी छांव में सुखाया था।' 'हां भई। दादाजी ने बताया।

बहुत कठिन दिन थे।" "सारे गांव में समय पर वर्षा होने पर फसल काटी और नवाब के धान वापस कर दिए पर तुम्हारे दोनों के परदादा उसी साल स्वर्ग सिधार गए। तब से वह धान किसी ने लौटाया ही नहीं। मेरे दादा ने अपनी फसल में से वह कर्ज चुकाया। आज तक तुम्हारी तीन पीढियों में किसी माई के लाल का कलेजा न हुआ कि वह कर्जा चुका दे। और यही कारण है कि तुम लोग दाने-दाने को मोहताज हो। अभी भी समय है कर्जा चुका दो।

शायद तुम दोनों के दिन बहुर जाएं।" गोनू झा ने चेतावनी दी। दोनों हक्का-बक्का रह गए। गोनू झा ने उनकी तीन पीढियों को आरोप लगा दिया था। 'यह सब झूठ है।' दोनों ने प्रतिवाद किया-'ऎसा कुछ भी नहीं था।" 'झूठ! शर्त के अनुसार तुम हार गए। मेरी गप्प को झूठ बताने पर तुहें, मुझे सौ-सौ रुपए देने थे न! लाओ।' दोनों का मुंह उतर गया। क्यों उन्होंने तैश में आकर उस गप्प को झूठी बताया।

बेचारें को अपनी जेब में रखे सौ-सौ रुपए निकालकर देने पड़े। कहां तो खुश थे कि आज गोनू झा की मिठाई खाई है और कहां खुद उनके वाक्जाल में फंस गए। गोनू झा ने दो सौ रुपए जेब में रखे। गांव समीप आ गया था। गोनू झा वहीं उतर गए। हीरन, फीरन लुटे-पिटे एक-दूसरे का मुंह देख रहे थे। गोनू झा मरे! गांव को पढ़े!! (कहानी) ये कहानी गोनू झा के गांव की है। उनके गांव में भी बहुत बड़े वाले रहिते थे।

कई लोग उनकी चालाकी से जलते थे, मगर मुंह पर उनके ‘पंखे’ बने फिरते थे। गोनू की छट्ठी बुद्धि को शक था कि ई लोगों के प्यार में कुछ झूठ छिपा है। ऊ बहुत दिन से गांव-घर के लोगों के अनमोल प्यार की परीक्षा लेने का पिलान बना रहे थे। अगर बात सिर्फ गांववालों की होती, तो गोनू अपनी जुगाड़ टेक्नॉल्जी से उन्हें तुरंत फिट कर देते। मगर उन्हें तो अपने घरवालों की बातों में भी मिलावट की बास आती थी।

तो उन्होंने सोचा कि क्यों न सबको एक बरी चेक किया जाए। बहुत सोच-विचार के गोनू एक दिन सुबह उठबै नहीं किए। सूरज चढ़ गया छप्पर पर, मगर गोनू झा बिछौना नहीं छोड़े। ओझाइन को जरा अंदेशा हुआ। गईं। जगाया तो ई का… आहि रे दैय्या… रे बाप रे बाप…!!! झा जी के मुंह से तो गाज-पोटा निकला हुआ था और बेचारे बिछौना से नीचे एगो कोना में लुढ़के पड़े थे। ओझाइन तो लगीं कलेजा पीटकर वहीं चिल्लाने।

बेटा भी मां की आवाज सुन कर बाबू के कमरे में आया। नजारा देखकर ऊका कलेजा भी दहल गया। उहो लगा फफक-फफक कर रोये। इधर ओझाइन कलेजा पर दुहत्थी मार-मारकर चिंघाड़ रही थीं, उधर बेटा कहे जा रहा है कि हमारा सब कुछ कोई ले ले, बस हमरे बाबूजी को लौटा दे। ई महादुखद खबर सुनकर गोनू से उनके मरने पर अपने खर्चा पर गंगा भेजने का वादा करने वाले मुखिया भी पहूंच गए। गोदान का भरोसा दिलाने वाले सरपंच बाबू भी।

लगे दुन्नो जने झा जी के बेटा को समझाए। “आ।।हा…हा…! बड़े परतापी आदमी थे। पूरे जवार में कोई जोर नहीं। अब विध का यही विधान था।’ उधर जिंदगीभर झा जी का चिलमची रहा अकलू हज्जाम औरत महाल में ज्ञान बांट रहा था। ‘करनी देखो मरनी बेला! देखा… गोनू झा जैसे उमिर भर सबको बुड़बक बनाते रहे, वैसा ही चट-पट में अपना प्राण भी गया। सारा भोग बांकिए रह गया।’ सरपंच बाबू ओझाइन को दिलासा दिए, ‘झा जी बहुत धर्मात्मा आदमी थे।

सीधे सरग गए हैं। अब इनके पीछे रोने-पीटने का कौनो काम नहीं है। कुछ रुपैय्या-पैसा रखे हैं तो गोदान करा दीजिये। बैकुंठ मिलेगा।’ उधर मुखिया जी गोनू के बेटे को बोले, ‘जल्दी करो भाई, घर में लाश ज्यादे देर तक नहीं रहना चाहिए। ऊपर से मौसम भी खराब है। प्रभुआ और सीताराम को तुम्हरे गाछी में भेज दिया है पेड़ काटने।

जल्दी से ले के चलो।’ फिर दो आदमी झा जी को पकड़कर कमरे से बाहर निकालने लगे, लेकिन गोनू झा की कद-काठी जितनी बड़ी थी, उनके घर का दरवाजा उतना ही छोटा था। अपना जिनगी में तो झा जी झुककर निकल जाते थे, लेकिन अभी लोग बाहर करिए नहीं पा रहे थे। तभी मोहन बाबू कड़ककर बोले, ‘अरे सुरजा बढ़ई को बुलाओ। दरवाजा काट देगा।’ सूरज तुरंत औजार-पाती लेकर हाजिर भी हो गया। तभी झा जी का बेटा बोल पड़ा, ‘रुको हो सूरज भाई!

बाबू जी तो अब रहे नहीं। ऊ बड़ा शौक से ई दरवाजा बनवाये रहे। ई का काटे से ऊ की आत्मा को भी तकलीफ होगा। अब तो ऊ दिवंगत होय गए। शरीर तो उनका रहा नहीं। सो उनका पैर बीच से काटकर छोटा कर देयो। फिर आराम से निकल जाएंगे।’ ‘हूं’ करके सूरज बढ़ई जैसे ही झा जी के घुटना पर आरी भिड़ाया कि गोनू झा फटाक से उठकर बैठ गए और बोले, ‘रुको! अभी हम मरे नहीं हैं।

ऊ तो हम तुम सब लोगों का परीक्षा ले रहे थे कि मुंह पर ही खाली अपने हो कि मरे के बाद भी।’ अब तो सरपंच बाबू, मुखिया जी, अकलुआ हज्जाम, सूरज बढ़ई और उनका अपना बेटा… सब का मुंह बसिया जलेबी की तरह लटक गया। आखिर सबकी कलई जो खुल गई थी। गोनू झा तो नकली मर के असली जी गए, लेकिन तभी से ई कहावत बन गया कि ‘गोनू झा मरे! गांव को पढ़े!!’ मतलब बुरे वक्त में ही हित और अहित की पहचान होती है।

गोनू झा की चतुराई (कहानी) मिथिला नरेश की सभा में उनके बचपन का मित्र परदेश आया था। नरेश उन्हें अपने अतिथि कक्ष में ले गए। उन्होंने अपने मित्र की खूब आवभगत की। अचानक मित्र की नजर दीवार पर लगे एक चित्र पर गई, चित्र खरबूजे का था। मित्र बोला - कितने सुंदर खरबूजे हैं। वर्षों से खरबूजे खाने को क्या, देखने को भी नहीं मिले। अगले दिन मित्र ने यही बात दरबार में दोहरा दी।

मिथिला नरेश ने दरबारियों की तरफ देखकर कहा- क्या अतिथि की यह मामूली-सी इच्छा भी पूरी नहीं की जा सकती? सारे दरबारी, मंत्री, पुरोहित खरबूजे की खोज में लग गए। बाजार का कोना-कोना छान मारा। गांवों में भी जा पहुंचे। गांव वाले उनकी बात सुनकर हंसते कि इस सर्दी के मौसम में खरबूजे कहां। जब सब थक गए तो एक दरबारी ने व्यंग्य से कहा- महाराज, अतिथि की इच्छा गोनू झा ही पूरी कर सकते हैं।

सच है इनके खेतों में इन दिनों भी बहुत सारे रसीले खरबूजे लगे हैं। मिथिला नरेश ने गोनू झा की तरफ देखा। नरेश की आज्ञा मानते हुए गोनू झा ने कुछ दिन का समय मांगा फिर कुछ उपाय सोचते हुए दरबार से चले गए। कई दिन बीतने पर भी गोनू झा दरबार में नहीं आए। पुरोहित ने कहा- कहीं डरकर गोनू झा राज्य छोड़कर तो नहीं चले गए।

एक सुबह जब मिथिला नरेश अपने मित्र के साथ बाग में टहल रहे थे तो गोनू झा कई सेवकों के साथ आए।सबने मिथिला नरेश को प्रणाम किया। सेवकों के साथ लाए टोकने जमीन पर रख दिए। उसमें खरबूजे थे। यह देख नरेश खुश हो उठे।

उनके मित्र ने कहा कि आज वर्षों बाद इतने अच्छे खरबूजे देख रहा हूं।मिथिला नरेश ने सेवकों से छुरी और थाली लाने को कहा तो गोनू झा बोले- क्षमा करें महाराज, हमारे अतिथि ने कहा था कि वर्षों से खरबूजे नहीं देखे इसलिए ये खरबूजे खाने के लिए नहीं, देखने के लिए हैं। ये मिट्टी के बने हैं। नरेश सहित सभी दरबारी गोनू झा की चतुराई पर दंग रह गए।

गोनू झा की चतुराई पर मित्र भी जोर से हंसा- वाह गोनू झा, समझो हमने खरबूजे देखे ही नहीं, खा भी लिए। मि‍थिला नरेश ने गोनू झा को उसकी चतुराई के लिए ढेर सारा इनाम देते हुए उसको शाबाशी दी कि तुम सचमुच इस दरबार के अनमोल रत्न हो, तुम्हारी सूझबूझ से आज मेरे मित्र की इच्‍छा पूरी हो सकी।

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