📖 कहानीबाबू

माघ अमावस्या पर ढेले का टोटका

📚 गोनू झा की कहानियाँ

गोनू झा के गाँव में एक बार चोरों का एक गिरोह सक्रिय हो गया । गोनू झा के घर से भी कुछ सामानों की चोरी हो गई । गोनू झा ने उस दिन ही संकल्प ले लिया कि जब तक वे चोरों को सबक न सिखा दें तब तक चैन की साँस नहीं लेंगे। माघ का महीना ! कड़ाके की ठंड ! शाम होते- होते गाँव में धुंध सा छा जाता और सुबह सूर्योदय के घंटों बाद भी घना कोहरा पूरे गाँव पर छाया रहता।

लोग शाम होते ही या तो घूरे को घेरकर आग तापने के लिए बैठ जाते या फिर अपनी रजाइयों में दुबक जाते । गाँव की सड़कें प्रायः शाम ढलने के बाद निर्जन सी हो जातीं । चोरों को माघ का महीना अपने लिए करिश्माई महीना लगने लगा था । रोज गाँव के किसी न किसी घर में चोरी होती ।

रोज चोरों की कारिस्तानी का शिकार हुए घर में कोहराम मचता और जब आवाज गोनू झा तक पहुँचती तो उनका संकल्प और – दृढ़ होता जाता और वे विचार -मंथन करने बैठ जाते कि क्या करें कि चोरों को काबू में लिया जा सके । गोनू झा ने गाँव में हुई चोरियों के बारे में जानकारियाँ जुटाईं तो इस तथ्य का उद्घाटन हुआ कि अधिकांश चोरियाँ रात नौ बजे से ग्यारह बजे के बीच या सुबह ढाई बजे से चार बजे के बीच हुई हैं ।

गोनू झा ने इसका अर्थ निकाला कि जाड़े की रात में आम तौर पर गाँव के घरों में लोग दरवाजे पर अलाव जलाकर सपरिवार आग तापने के लिए बैठते हैं या फिर घर के किसी कमरे में बोरसी में आग रखकर सपरिवार हाथ सेंकने बैठते हैं ।

चोर या तो इस समय अपने हाथ की सफाई दिखाते हैं या फिर सुबह में जब बिस्तर गर्म हो जाता है तब रजाइयों में लिपटे लोगों को गहरी नींद आ चुकी होती है, चोर उस समय उनकी नींद का लाभ उठाकर अपने काम को अंजाम देते हैं । अब, जब यह रहस्य गोनू झा ने खोज लिया तब प्रायः वे शाम को दरबार से लौटते समय गाँव के किसी स्थान पर लगे अलाव के पास हाथ सेंकने के लिए बैठ जाते ।

धीरे- धीरे चोरों को पता चल गया कि गोनू झा शाम में घर नहीं लौटते । कई बार तो रात के दस -ग्यारह, यहाँ तक कि बारह बजे तक उनका पता नहीं रहता । फिर क्या था ! चोरों ने फिर से गोनू झा के घर को निशाना बना लिया और वहाँ से बड़ा हाथ मारने की तैयारी में जुट गए । अमावस की रात थी । गोनू झा गाँव के मुखिया के दरवाजे से आग तापकर अलमस्ती में गुनगुनाते हुए अपने घर आए ।

दरवाजे पर उन्होंने कुछ अटपटी आवाज सुनी तो उन्होंने आवाज की दिशा में देखना शुरू किया । उनके घर के पिछवाड़े बगीचा था जिसमें आम, लीची, कटहल, अमरूद आदि अनेक फलदार वृक्ष लगे हुए थे। और सफाई नहीं कराए जाने के कारण घनी झाडियाँ फैली थीं । आहट उन्हीं घनी झाड़ियों की ओर से आ रही थी । गोनू झा ने एक बड़ा सा रोड़ा उठाकर आवाज की दिशा में निशाना साधकर फेंका तो झाडियों में सरसराहट हुई ।

गोनू झा को समझते देर न लगी कि झाडियों में कोई छुपा हुआ है । फिर क्या था ! उन्होंने ऊँची आवाज में अपनी पत्नी को आवाज दी । जब पंडिताइन घर से बाहर निकली तब गोनू झा ने कहा “पंडिताइन ! देख, इधर-उधर बहुत ढेला होगा। एक सौ आठ ढेला चुन के लाओ। आज माघ अमावस्या की रात है ।

आज की मध्य रात्रि तक घर के दक्षिण दिशा में एक सौ आठ ढेले फेंके जाएँ तो घर के लोगों पर यदि किसी ग्रह का दुष्प्रभाव पड़ने वाला हो तो स्वतः दूर हो जाता है। जाओ, देर न करो। थोड़ी ही देर में रात का दूसरा पहर गुजर जानेवाला है।" पंडिताइन वहाँ से बुदबुदाती हुई गई । कच्ची नींद से जगी थी सो खीज गई थी । पंडिताइन जब एक ढेला लेकर आई तो गोनू झा ने ढेला अपने हाथ में लेते हुए कहा “अरे भाग्यवान ! कुढ़ना बाद में ।

तुम्हें इस काम का महत्त्व नहीं मालूम इसलिए गुस्सा कर रही हो । जाओ, जितनी जल्दी हो, अँचरा में ढेला भर-भर के यहाँ रखती जाओ, मैं खुद गिन -गिनकर ढेला फेकूँगा। ढेला फेंकने के समय मंत्र भी पढ़ना होता है । कुछ भी ऐसा मत करना जिससे मुझे गुस्सा आए।" पंडिताइन झुंझलाती हुई गई और अपने आँचल में कुछ रोड़े लेकर आई ।

गोनू झा के सामने उन रोड़ों को पटकते हुए बोली-“लोगों का उम्र बढ़ता है तो दिमाग समझदार होता है और एक ई हैं कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ बेदिमाग होते जा रहे हैं सारा ज्ञान खूटा में टाँग के जोग -टोंग और टोना -टोटका करने में लगे हैं ।

आधी रात होने को आई और ये हैं कि खाना- पीना त्याग के ग्रह- दशा सुधारने के काम में लगे हुए हैं ।" गोनू झा ने पत्नी की झुंझलाहट पर ध्यान नहीं दिया और अंधेरे में निशाना साध -साधकर ढेला फेंकते रहे । पत्नी दो -तीन चक्कर ढेला ढोने के बाद हाँफने लगी और बोली-“अब मैं नहीं जाती ढेला चुनने । क्या बेकार के काम में लगे हुए हो ! जाओ, हाथ-मुँह धो लो और चल के खाना खा लो ।

भला ढेला फेंकने से कहीं किसी की ग्रह-दशा सुधरी है !" गोनू झा ने डपटते हुए कहा, " शुभ-शुभ बोलो भाग्यवान! तुम तो केवल ढेला ढोने में थक रही हो । आखिर मैं जो कर रहा हूँ वह पूरे घर की भलाई के लिए ही तो कर रहा हूँ।" पंडिताइन का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुँचा। वह लगभग फुँकारते हुए बोली-“मैं अब ढेला-रोड़ा नहीं चुनूँगी।

तुम्हें ग्रह-दशा सुधारनी है तो खुद जाओ और चुनकर लाओ ढेला-रोड़ा और फेंकते रहो रात भर घर के दक्खिन में ।" गोनू झा भी तेवर में आ गए । एक ढेला हाथ में लेकर निशाना साधते हुए उन्होंने बगीचे में फेंका। ढेला इधर किसी को छप्प से लगा। झाड़ी थोड़ी हिली और शान्त हो गई । गोनू झा की आँखें अब तक अँधेरे में देखने की अभ्यस्त हो चुकी थीं और अपने लक्ष्य पर टिकी थीं ।

दूसरा ढेला हाथ में तोलते हुए उन्होंने कहा -"जाओ, ढेला लेकर आओ। अब मन्त्र सधने लगा है । कोई विघ्न मत डालो।" पंडिताइन अड़ी हुई थी कि वह ढेला चुनने के लिए कतई नहीं जाएगी। नौबत यह आई कि गोनू झा निशाना साधकर एक ढेला फेंकते और पत्नी को कोसने लगते – “हे भगवान ! यह कैसा कलयुग आ गया कि पत्नी अपने पति की बात नहीं मानती ।

पति तो मिथिलांचल की महिलाओं के लिए परमेश्वर होता था ...” पंडिताइन गोनू झा के गुस्से से बेपरवाह अड़ी थी कि वह अब ढेला नहीं चुनेगी । गोनू झा के स्यापा से वह और भड़की और मुँह लगा जवाब देने लगी । दोनों का तू- तू, मैं -मैं धीरे-धीरे चीख-चिल्लाहट में बदलने लगा। गोनू झा चीख रहे थे -" जा-जा ।" पंडिताइन चीखती-“नहीं जाती ।

नहीं लाती ।" गोनू झा चीखते-“दे।” पंडिताइन चीखती-“नहीं देती ।" दोनों की चीख-चिल्लाहट से पड़ोसियों की नींद खुली । वे यह देखने के लिए कि गोनू झा और उसकी पत्नी क्यों चीख रहे हैं-हाथ में लाठी और मशाल लिए अपने घरों से निकल आए। गोनू झा ने देखा कि पास-पड़ोस के लोग उनके घर पहुँच गए हैं तब उन्होंने कहा -” आइए भाइयो । देखिए कलयुग का नजारा । ये मेरी धर्मपत्नी हैं पतिव्रता नारी ।

इनको मैंने इधर -उधर से एक सौ आठ ढेला चुनकर लाने को कहा तो चालीस- पचास ढेला लाने के बाद अपना पतिव्रत धर्म त्यागकर पति से मुँह लगाने लगीं और उधर देखिए..." उन्होंने बगीचे की ओर इशारा करते हुए कहा -" वहाँ वह भाई साहब हैं जो चालीस -पचास ढेला खाने के बाद भी एक शब्द नहीं बोले ।" बगीचे में छुपा चोर अब समझ गया था कि गोनू झा ढेला उसी को निशाना साधकर मार रहे थे।

वह वहाँ से भागने की कोशिश करने के लिए उठा लेकिन मशाल और लाठी से लैस गोनू के पड़ोसियों के आगे उसकी एक न चली । अन्ततः लोगों ने उसे दबोच लिया । गोनू झा उसके पास आए और उसका चेहरा देखते हुए कहने लगे, अरे ! भाई। ढेलों से चोट जरूर लगी होगी । अब जाओ हवालात में ।

ये लोग तुम्हारी मरहम पट्टी का इन्तजाम कर देंगे।" चोर को हवालात भेजने के बाद गोनू झा ने अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा और बोले, “ढेला ढोने से हाथ दुख रहा होगा चल दबा दूं।" पंडिताइन जो कि इस तरह घटनाक्रमों में आए नाटकीय परिवर्तन से घबरा गई थी, बोली -" न पंडित जी । हाथ नहीं दुख रहा।

मैं असल में समझी नहीं थी कि तुम क्या कर रहे हो इसलिए गुस्सा आ गया ।" गोनू झा हँसते हुए पंडिताइन का कंधा थपथपाते हुए घर की ओर चले गए। साधु बन गए गोनू झा (कहानी) मिथिलांचल में साध- सन्तों में लोगों को काफी भरोसा है । गोनू झा के जमाने में भी था । गोनू झा के पिता सत्संग प्रेमी थे। साधु- सन्तों की सेवा करना अपना धर्म समझते थे। तांत्रिकों-ज्योतिषियों पर खर्च करने से भी वे पीछे नहीं रहते ।

गोनू झा ने उन्हें कई बार समझाया मगर उनके पिता पर कोई असर नहीं हुआ । आए दिन ज्योतिषियों और साधु सन्तों का आना उनके घर में जारी रहा । एक दिन गोनू झा ने अपने पिता को साधु-सन्तों की अंध आस्था से निकालने की ठान ली । उन्होंने घर में घोषणा की कि उन्हें कुछ काम से बाहर जाना है, दो -तीन माह में वे लौट आएंगे । माता-पिता के चरण छूकर वे घर से निकल पड़े । गाँव से बाहर जाकर गोनू झा ने एक तालाब में स्नान किया।

झोले से गेरुआ वस्त्र निकालकर धारण किया । नकली दाढ़ी-मूंछे और जटाओं जैसी संरचना की टोपी लगाई और फिर सिर पर गेरुआ पगड़ी लगा ली कि यह तो लगे कि जटाधारी साधु हैं मगर जटा नकली है इसका अन्दाजा किसी को नहीं लगे। दर्पण में झाँककर देखा तो पूरी तरह सन्तुष्ट हुए कि उन्हें कोई पहचान नहीं सकता । फिर उन्होंने रही सही कसर ललाट पर चन्दन के आलेपन से पूरी की ।

उसी तालाब के पास के एक बरगद के पेड़ के नीचे उन्होंने धूनी रमाई और पद्मासन लगाकर ध्यानमस्त मुद्रा में आ गए । उन्हें मालूम था कि देर-सबेर गाँव का कोई न कोई आदमी इधर से गुजरेगा ही और एक साधु को धूनी रमाये वहाँ बैठा देख, इस बात की सूचना उनके पिता को अवश्य देगा ।

अभी अधिक समय नहीं गुजरा था कि गाँव का एक किसान उनके पास आया मगर गोनू झा तो ध्यानमस्त थे-उसकी तरफ देखा तक नहीं, किसान थोड़ी देर तक हाथ जोड़े बैठा रहा । मगर जब 'साधु महाराज' हिले तक नहीं तो वहाँ मत्था टेककर उठ खड़ा हुआ । गोनू झा उसे जाता देख मन ही मन खुश हुए । उन्हें विश्वास था कि गाँव में अब यह चर्चा हो जाएगी कि तालाब के किनारे एक सिद्ध महात्मा धूनी रमाये बैठे हैं ।

गोनू झा अपने साथ झोले में पर्याप्त मेवे और फल लेकर आए थे। इसलिए उन्हें भोजन की परवाह नहीं थी । दूसरे दिन जब आम साधुओं की तरह वे भोजन की व्यवस्था के लिए गाँव में नहीं गए तब ग्रामीणों को विश्वास हो गया कि तालाब किनारे बैठा साधु कोई सिद्ध पुरुष है । इस बात की खबर गोनू झा के पिता को भी लगी तो उनसे रहा नहीं गया । वे महात्मा के दर्शन के लिए तालाब किनारे पहुँचे।

अपने पिता को आया देख गोनू झा ध्यानमस्त हो गए । गोनू झा के पिता वहाँ काफी देर तक बैठे रहे मगर साधु महाराज की तंद्रा भंग नहीं हुई । उनके पिता गाँव लौट आए। गाँव में चर्चा फैल गई कि गाँव के बाहर एक महात्मा तपस्या में लीन हैं समाधि की अवस्था में हैं । साधु महाराज के दर्शन के लिए ताँता लग गया । तीसरे दिन उस स्थान पर ग्रामीणों की भीड़ जम गई।

कुछ उत्साही ग्रामीणों ने वहाँ भजन -कीर्तन करना शुरू कर दिया तब जाकर महात्मा जी ने आँखें खोलीं। लेकिन कुछ बोले नहीं। सबसे अधिक उत्सुकता गोनू झा के पिता को ही थी । वे बढ़े और महात्मा जी के चरण छू लिए और कहा-“कुछ बताइए महाराज!" गोनू झा ने पद्मासन में बैठे-बैठे ही पास पड़ी एक स्लेट उठाई और उस पर चॉक से लिखा-“आप लोग जाएँ । कल आएँ। मेरा मौन व्रत है।" सभी लौट गए । दूसरे दिन ग्रामीण आए।

कोई फल लेकर तो कोई मिठाई लेकर। सबने साथ लाई चीजें साधु महाराज के कम्बल पर श्रद्धापूर्वक रख दीं-धूनी के पास और मत्था टेककर बैठ गए। गोनू झा ने स्लेट पर लिखा-आप सब लौट जाएँ। आज केवल एक व्यक्ति, और उन्होंने अपने पिता को इशारा से बुलाया और बैठ जाने का संकेत किया । ग्रामीण लौट गए । भला महाराज जी के आदेश की अवहेलना कैसे होती ? गोनू झा के पिता गद्गद थे।

उन्होंने फिर कहा-"महाराज कुछ बताइए!" और गोनू झा ने स्लेट पर उनके अतीत के बारे में ऐसी- ऐसी बातें लिखीं जो गाँव के लोग कतई नहीं जानते थे। इसी तरह उनके रोग, उनकी कामनाएँ, पुत्र और पत्नी से सम्बन्ध के बारे में भी स्लेट पर सटीक एवं बिलकुल खड़ी बातें गोनू झा ने लिख दीं । गोनू झा उनके बेटे ही तो थे। उनकी सारी सच्चाइयों से अवगत ।

गोनू झा के पिता ने अब तक ऐसा गुनी महात्मा नहीं देखा था ... वे अभिभूत हो गए और महात्मा जी के चरण पकड़ लिए । “मेरा कल्याण करें महाराज ! मेरे घर पधारें ।" उन्होंने विनती की । महात्मा बने गोनू झा ने स्लेट पर लिखा-धैर्य धारण करें । अवश्य आऊँगा। एक दिन । अभी आप जाएँ। विश्राम करें। गोनू झा के पिता लौट आए । गाँव के लोगों ने उन्हें अपने घर जाते देखा तो पूछने चले आए-"महात्मा जी ने क्या कहा ?

वे बोले या वैसे ही स्लेट पर लिखकर ही कुछ बताया ?" गोनू झा के पिता ने महात्मा जी की खूब सराहना की । ग्रामीणों का ताँता इसके बाद गोनू झा के धूनी स्थल पर रोज लगने लगा । रोज किसी न किसी को गोनू झा रोक लेते और उसके अतीत की सीधी-सच्ची बात स्लेट पर लिखकर कुछ जरूरी सलाह भी उसके साथ लिख देते । अब तो गाँव में 'महात्मा जी' की धूम मच गई । इस तरह एक महीना बीत गया । गोनू झा अब इस नाटक से ऊब गए थे।

उन्होंने उस दिन स्लेट पर लिखा-कल मैं मौन व्रत खोलूँगा । आज मुझे एकांत चाहिए। ग्रामीण आए । माथा टेका और वापस लौट गए । इसके बाद वाले दिन गाँव के लोग सुबह से ही वहाँ पहुँचने लगे। सबसे पहले आने वालों में गोनू झा के पिता थे। गोनू झा ने मौन व्रत खोला, सबको उपदेश दिया और कहा कि अब वे प्रस्थान करेंगे। ग्रामीण इस बात का आग्रह कर रहे थे कि वे एक बार गाँव अवश्य चलें ।

गोनू झा के पिता ने उन्हें याद दिलाया, “महात्मा जी ! आपने मुझे आश्वस्त किया था कि एक दिन मेरे घर अवश्य आएँगे।" गोनू झा ने अपनी विशिष्ट मुद्रा में कहा-“अवश्य ! मुझे स्मरण है!" फिर गोनू झा ग्रामीणों के साथ अपने पिता के दरवाजे पर पहुंचे। उन्होंने कहा -" अब विलम्ब नहीं करें । मुझे प्रस्थान करना है।" ग्रामीण अपने-अपने घरों से चढ़ावा लेकर आए और आग्रहपूर्वक गोनू झा महाराज जी को भेंट किया ।

उनके पिता ने भी एक रत्नजड़ित स्वर्ण मुद्रिका उन्हें भेंट की और आग्रहपूर्वक दक्षिणा के रूप में एक हजार एक रुपए प्रदान किए। ग्रामीणों ने भी यथाशक्ति भक्ति दिखलाई । महात्मा बने गोनू झा ने वह धनराशि अपने झोले में डाली और अलख निरंजन का घोष करते हुए उठ खड़े हुए । ग्रामीण उनके पीछे पीछे गाँव के बाहर तक आए । फिर गोनू झा ने रुककर सबसे कहा-“आप सब अपने घरों को लौट जाएँ । मोह में नहीं पड़ें ।

अपने कर्तव्यों का पालन करें, फिर अलख निरंजन का घोष करते हुए खड़ाऊँ खटखटाते हुए आगे बढ़ गए । इसके दस दिनों के बाद गोनू झा अपने समान्य रूप में घर लौटे । उन्हें घर आया देख उनके सरल चित्त पिता बहुत खुश हुए। उन्होंने गाँव में एक सिद्ध- पुरुष के आने की घटना का पूरा वृतान्त उन्हें विस्तारपूर्वक बताया । गोनू झा मुस्कुराते हुए अपने पिता की बातें सुनते रहे ।

जब उनके पिता चुप हुए तब गोनू झा ने अपनी जेब से ढेर सारे रुपए निकालकर अपने पिता को दिए। उनके पिता इतने सारे रुपए देखकर चकित हो गए। फिर गोनू झा ने जेब से अँगूठी निकाली और अपने पिता को दे दी । अँगूठी देखते ही उनके पिता चौंक पड़े क्योंकि यही अँगूठी उन्होंने महात्मा जी को श्रद्धापूर्वक भेंट की थी । बिना कुछ बोले गोनू झा ने अपने झोले से जटा-जूट, दाढ़ी-मूँछे और गेरुआ वस्त्र निकालकर पिता के सामने रख दिया ।

उनके पिता समझ गए कि महात्मा जी का रहस्य क्या था । वे बोले -" बेटा गोनू! तुमने मेरी आँखें खोल दीं । मैं अब कभी भी महात्माओं के चक्कर में नहीं पडूंगा।"

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