📖 कहानीबाबू

धन की सुरक्षा का कारण

📚 गोनू झा की कहानियाँ

गोनू झा मिथिला-दरबार के विदूषक बनाए जाने से पहले विपन्न थे। उन्हें कोई पूछता नहीं था । जब वे मिथिला नरेश के प्रतिष्ठित दरबारी बन गए तो गाँव में 'गोर लागै छी' ( पाँव छूता हूँ ) कहने वालों की कमी न रही । विवाह के बाद तो नाते -रिश्तों की भी बाढ़ आ गई । कोई उनके ममहर से आता तो कोई बुआ के घर से । घर में आने-जाने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही थी ।

एक रात गोनू झा अपने बिस्तर पर पड़े- पड़े अतीत की बातें याद कर रहे थे। पिता के मरने के बाद कितने बुरे दिन देखे थे उन्होंने ! उन्हें याद आया कि मिथिला में एक बार अकाल पड़ा था और वे अपने अनुज भोनू को लेकर बाजार में मजदूरी करने के इरादे से गए थे। कहीं कोई काम नहीं मिला था और भोनू भूख से बिलबिला रहा था ।

अन्त में उन्होंने भोनू को एक हलुवाई की दुकान में भेजकर उसे भर पेट भोजन करवाया था और पैसे की माँग पर दुकानदार को झूठ बोलकर आफत में डाल दिया था कि भोनू खाने से पहले ही पैसा दे चुका है। इस घटना को याद करते हुए उनका मन भर आया और आँखें गीली हो गईं । उफ ! कैस-कैसे दिन कटा ? फिर भगवान की माया। दिन पलटे । भाग्य बदला । जो लोग देखकर मुँह फेर लेते थे, आज उन्हें देखकर आह्लादित हो उठते हैं ।

जीवन के इस परिवर्तन पर गोनू झा स्वयं विस्मय कर रहे थे। कितना कुछ बदल गया है ! पहले एक कटोरी दूध के लिए तरसते थे। आज बथान में दसियों गायें हैं । सोने के लिए कभी चिथड़ी सी चटाई थी, आज मेहमानों के लिए भी पलंग है । अतीत के चिन्तन से गोनू झा को लगने लगा कि आज उनके पास पैसा है इसलिए उन्हें लोग पूछने आते हैं । जब वे आर्थिक विपन्नता के शिकार थे तो कोई बासी रोटी भी देने के लिए तैयार नहीं था ।

समय कितना बदल गया ! फटी हुई धोती की जगह आज चक-चक रेशमी धोती में वे निकलते हैं । दरवाजे पर गाय -बैल, नौकर-चाकर क्या नहीं है उनके पास! आखिर यह सब तो पैसे के कारण ही-'बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया ।' यह सब रुपैया का खेल है ! चाँदी का चमत्कार है । इसी चिन्तन में गोनू झा की रात कट गई । सुबह वे देर तक सोते रहे । पत्नी ने जब उन्हें जगाया तब दिन चढ़ आया था । जगने पर भी गोनू झा अनमने से दिख रहे थे।

न दरबार जाने की हड़बड़ी थी, न आम दिनों की तरह बात-बात पर पंडिताइन से चुहल करने की शोखी। पत्नी ने जब पूछा कि तैयार कब होंगे, दिन चढ़ आया है, दरबार नहीं जाना है क्या, तब बहुत ही उदास स्वर में गोनू झा ने उत्तर दिया-“नहीं ! आज कुछ भी करने का जी नहीं हो रहा है । “और वे फिर से बिस्तर पर लेट गए। पंडिताइन आई । चिंतातुर होकर । नेह से भरकर ।

गोनू झा का ललाट छुआ यह देखने के लिए कि क्या गोनू झा को बुखार तो नहीं है ? गोनू झा ने प्यार से अपनी पत्नी का हाथ पकड़ लिया । बोले-“नहीं, बुखार नहीं है। फिर उन्होंने पंडिताइन से कहा-“एक बात बताओ, यदि मेरे पास यह धन -दौलत और सुख सुविधा नहीं होती, तब भी क्या तुम मुझसे इतना ही प्यार करतीं ?" पंडिताइन अवाक रह गई । 'अरे ! यह क्या बात ले बैठे ? कहीं किसी ने कान तो नहीं भरे इनके ?

चुगली लगाने वालों की तो कमी नहीं है न ! घर में ही तो कितने हैं जलनेवाले!' मन में इस तरह की उठती आशंकाओं को दबाते हुए पंडिताइन ने कहा-“आप कैसी बातें कर रहे हैं ? जन्म-जन्मांतर का सम्बन्ध है हमारा। आपके मन में यह सवाल क्यों आया कि आप अपनी तुलना धन-दौलत से करने लगे? मेरे लिए सारी दुनिया की दौलत एक ओर और आपको एक ओर रखकर पूछा जाए कि मुझे क्या चाहिए तो मैं आपका साथ पसन्द करूँगी।

अब कभी मुझसे ऐसी बातें न कहिएगा।" पत्नी की बात सुनकर गोनू झा मुस्कुराए और पत्नी का हाथ चूम लिया । थोड़ी देर तक पलकें बंद किए लेटे रहे । फिर बोले-“जाओ, जरा माँ को भेज दो ।" पत्नी चली गई । कमरे में माँ आईं । बेटे के अस्वस्थ होने की बात बहू ने उन्हें बता दी थी । इसलिए मातृ-सुलभ स्नेह से भरकर गोनू झा के सिरहाने बैठकर उन्होंने गोनू झा का सिर सहलाना शुरू कर दिया ।

गोनू झा ने आँखें बन्द किए हुए ही अपने सिर पर फिर रहे माँ के हाथ को थाम लिया । फिर पूछा-“माँ, तुम मुझे इतना प्यार करती हो, कुछ हो जाता है तो बेचैन हो जाती हो, आखिर क्यों ?" गोनू झा की माँ बोलीं-“बावरे! ये भी कोई बताने की बात है ? तू मेरी कोख का जाया है । मैंने तुझे पय पान कराया है। गोद में खेलकर तू बड़ा हुआ है ।

भला मुझे तुम्हारी चिन्ता न होगी तो और किसकी होगी ?" गोनू झा उसी तरह आँखें बन्द किए थोड़ी देर तक चपचाप लेटे रहे । फिर माँ से पूछा-“माँ, बुरा न मानो तो एक और बात पूछूँ?" " हाँ बेटा, बोल! क्या बात है। मैं तेरी किसी भी बात का बुरा नहीं मानूंगी ।" माँ ने उत्तर दिया ।

गोनू झा ने संयत स्वरों में पूछा-“माँ, यदि मेरे पास यह समृद्धि न होती तब भी क्या मेरे लिए तुम्हारे मन में ऐसा प्यार उमड़ता ?" गोनू झा की माँ के मुँह से एक सर्द आह निकली। उनका हाथ काँपने लगा -" अरे, आज मेरे लाल को क्या हो गया है, जो ऐसी बहकी-बहकी बातें कर रहा है?" अनिष्ट की आशंका से उनका मन काँप गया और वे फफक पड़ीं । टप् ! आँख से आँसू निकलकर गोनू झा के ललाट पर गिर पड़ा ।

गोनू झा ने आँखें खोली तो पाया कि उनकी माँ रो रही हैं फिर भी उन्होंने अपनी संवेदनाओं पर काबू पाते हुए माँ से कहा-“माँ, रो मत, मुझे बता-जब मेरे पास धन नहीं होता तब भी क्या तुम मुझसे इतना ही प्यार करतीं ? मेरा मन यह जानने के लिए बेचैन हो रहा है कि दुनिया में जन का महत्त्व है या धन का ? क्यों इतनी स्पर्धा है ? क्यों इतना फरेब है ? क्यों लोग दूसरों की तरक्की से जलते हैं ?

क्यों इतनी आपाधापी मची रहती है ? क्यों, आखिर क्यों ? तुम मुझे बचपन से अच्छी-अच्छी बातें सिखाती रही हो । जब मेरा मन इन सवालों से विचलित हो रहा है तब तुम्हीं बताओ न माँ कि मैं किससे जाकर पूछ ? मेरी जन्मदाता भी तुम्ही हो । ज्ञानदाता भी तुम्हीं हो । तुम्हारे सिवा मेरा गुरु कोई दूसरा नहीं है।” गोनू झा भावातिरेक में बोलते गए । माँ की आँखें फिर भर आईं।

अपने पुत्र के हृदय में उनके प्रति जो मान था, आज पहली बार इस तरह प्रकट हुआ था । उन्हें लगा कि गोनू आज भी बच्चा है-उनका प्यारा, लाडला, दुलारा बच्चा। स्नेह से गोनू झा के बालों को सहलाते हुए वे बोलीं -" बेटा! मेरे लिए अब धन का क्या मोल ? तू है तो संसार है । तेरी खुशियाँ देखते-देखते ही आँखें बन्द हों, यही अरमान लिए जीती हूँ ।" फिर वे गोनू झा के सिर को चूमते हुए बोलीं -" बेटा !

इस तरह की बातें मत सोचा कर । इस तरह की बातों से विरक्ति पैदा होती है। अभी तू जवान है। जीवन के रंगों में रम । मत सोच मेरे लाल । कुछ मत सोच।" गोनू झा थोड़ी देर तक बिस्तर पर लेटे रहे-पलकें मूंदे। माँ के स्पर्श का सुख प्राप्त करते रहे । थोड़ी देर बाद उन्होंने कहा-“जाओ माँ, आराम करो। मुझे कुछ नहीं हुआ है। हाँ, जरा भोनू को भेज देना। काम है।" माँ को लगा, गोनू झा पर उनकी बातों का असर हुआ है ।

वे संतोष से उठीं और भोनू झा को भेज दिया । भोनू झा को भी जानकारी मिल चुकी थी कि आज भैया का स्वास्थ्य ठीक नहीं है जिसके कारण वे दरबार नहीं गए हैं । माँ ने जब उससे बताया कि जाओ, भैया बुला रहा है तब भोनू झा तेजी से गोनू झा के पास आया । गोनू झा की आँखें बन्द देखकर उसने सोचा-भैया शायद सो गए हैं । ऐसा सोचकर वह गोनू झा के पायताने में जाकर बैठ गया और धीरे- धीरे उनके पाँव दबाने लगा ।

गोनू झा ने बिना आँखें खोले भोनू झा से पूछा-“भोनू! मेरे भाई! एक बात बता – यदि तुम्हारा भैया इतना सम्पन्न नहीं होता, तब भी क्या तू मुझे इतना ही सम्मान देता ?" भोनू को लगा कि भैया को बँटवारे वाली बात शायद आज भी मन में बैठी हुई है । एक बार वह रूपलाल के बहकावे में आकर घर का बँटवारा करा लिया था लेकिन यह तो भैया ही थे कि समझदारी से रूपलाल की चालों को मात दे दी थी और घर टूटने से बचा लिया था ।

भोनू झा का मन ग्लानि से भर उठा । उसने गोनू झा से कहा-“भैया । पुरानी बातों को भूल जाओ। मैं आपका भोनू हूँ । वही भोनू जिसे आप अपने कन्धे पर बैठाकर घुमाते थे। वही भोनू जिसकी छोटी से छोटी इच्छा पूरी करने के लिए आप अपनी भी परवाह नहीं करते थे। धन -दौलत मेरे लिए बहुत माने नहीं रखते । मेरे लिए तो बस आपका आशीर्वाद काफी है ।" गोनू झा ने कहा-“ठीक है भोनू । जाओ, जो कर रहे थे, करो। मेरा मन घबरा रहा है ।

मुझे आराम करने दो । घर में सबसे कह दो मुझे जगाएँ नहीं, यदि मैं सो जाऊँ तो ।" भोनू चला गया । गोनू झा बिस्तर पर लेटे रहे । दिन ढला । शाम हुई । फिर रात। चाँद आसमान में चढ़ने लगा । एक पहर रात चढ़ने के बाद गोनू झा की पत्नी कमरे में आई तो यह देखकर चौंक गई कि गोनू झा का शरीर उसी मुद्रा में है जिस मुद्रा में दिन में था । मुँह खुला हुआ है । हाथ ऐंठा-सा है । टाँगें अकड़ी हुई हैं । उसका कलेजा धड़कने लगा।

दैव ! यह क्या ? क्या ये चले गए? ऐसा सोचते-सोचते उसके मुँह से विकल सी चीख निकल गई -" माँ ... जी । भोनू... ? दैब रे दैब !" वह दहाड़ मारकर रो पड़ी । उसका विलाप सुनकर गोनू झा की माँ कमरे में आईं । भोनू झा भी कमरे में आया। भोनू हत्प्रभ रह गया और गोनू झा की माँ गोनू झा का ऐंठा शरीर और बहू का विलाप सुनते बेहोश हो गईं । गोनू की पत्नी का विलाप सुनकर आसपास के लोग जुट आए ।

गाँव में यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई कि गोनू झा नहीं रहे । आसपास के घरों की महिलाएँ भी जुट आईं। कोई गोनू झा की माँ को होश में लाने का प्रयत्न करने लगी तो कोई गोनू झा की पत्नी के साथ ही विलाप करने लगी । सारा माहौल द्रवित कर देनेवाला हो गया । गाँव के लोगों ने गोनू झा के शरीर को बिस्तर से उठाकर आँगन में रखा। उनमें कुछ लोग ऐसे भी थे जो पहले भी गोनू झा को मुर्दा देख चुके थे और ‘शव स्नान करा चुके थे।

वे लोग आपस में खुसुर-पुसुरकर रहे थे-बड़ा विचित्र प्राणी है यह मरकर भी जी उठने वाला । क्या पता, फिर जी जाए ? जबकि कुछ लोग कह रहे थे – गर्मी का मौसम है -बास आने से पहले लाश उठ जाए तो ठीक रहेगा ।... गोनू झा की अन्तिम यात्रा की तैयारियाँ होने लगीं। मशाल जला लिए गए कि उसकी रोशनी में श्मशान यात्रा हो सके। घर में शोक का वातावरण था ।

गोनू झा की माँ होश में आ गई थीं और वे गाँव की वृद्ध महिलाओं के साथ विलाप कर रही थीं । उन्हें दिलासा देनेवालियों का कलेजा बैठा जा रहा था । गोनू झा की पत्नी छाती पीट- पीटकर करुण स्वरों में रूदन कर रही थी । भोनू झा को तो जैसे काठ मार गया था । अवसन्न अवस्था में वह गाँव के युवकों से घिरा था ।

जब गोनू झा के शरीर का स्नान हो चुका और लोग शरीर को उठाने लगे तब माँ ने विलापते हुए ही कहा -” अरे भोनू, गोनू की अंगुली में सोने की अंगूठी है और कान में कनौसी, निकाल ले ! जानेवाला तो चला गया बेटा । अब उसकी चीजें ही तो उसकी यादगार रहेंगी । इन्हीं स्मृतियों के सहारे अब बाकी जीवन बिताना होगा ।" फिर वे जोरों से विलाप करने लगीं ।

भोनू झा ने कनौसी और अँगूठी निकाल ली और वहाँ से हटने ही वाला था कि गोनू झा की पत्नी ने विलाप करते हुए कहा -" भोनू, उनके जनेऊ में सन्दुक की चाबी है -बँधी हुई । खोल लेना।" विलाप के स्वर में ही उनका दूसरा आदेश उमड़ा -"रे भोनू, तुम्हारे भैया के डाँरा ( काला धागा जो मिथिलांचल के लोग कमर में बाँधते हैं ) में तिजोरी की चाबी बँधी है-निकाल लेना रे।

दैब रे दैब ...” और फिर उसके विलाप का स्वर पहले की लय में आ गया । भोनू झा ने जनेऊ और डाँरा से चाबियाँ खोल लीं । तभी एक चमत्कार-सा हुआ । गोनू झा के मुँह से निकला -” हे राम! दीनबन्धु ! दीनदयाल । जै माँ !" और वे उठकर बैठ गए । आँगन में मशाल के नीम उजाले में लोगों ने देखा, गोनू झा उठकर बैठ गए और पास में पड़े कपड़े से अपना तन ढंक लिया और अनजान बनते हुए बोले-“क्या बात है ?

मैं आँगन में इस हाल में क्यों पड़ा हूँ ? यहाँ इतनी भीड़ क्यों है ?" किसी को कोई जवाब देते नहीं बना। सब अपने-अपने घर की ओर चल पड़े । आपस में इस चमत्कार के बारे में बतियाते हुए । गोनू झा को जीवित देख उनकी मां और पत्नी का विलाप थम- सा गया । वे ईश्वर के प्रति श्रद्धानत हो गईं कि गोनू झा का जीवन वापस हो गया है। उनकी साँसें लौट आई हैं । गोनू झा प्रसन्नचित्त वहाँ से उठे ।

भोनू झा ने उन्हें सहारा दिया तो भोनू के कंधे को प्यार से थपथपाते हुए उन्होंने कहा-“मेरे भाई। निश्चिन्त रहो। तुम्हारे भैया को कुछ नहीं होनेवाला। जाओ भाभी से बोलो मेरे लिए भोजन परोस दे। मैं मुँह धोकर अभी आता हूँ।" गोनू झा की पत्नी ने खाना गर्म किया और प्यार से परोसा । जब गोनू झा खाने बैठे तो उनकी माँ हाथ में बेना (पंखा ) लेकर उनके पास बैठीं । उनकी पत्नी और भाई भोनू भी उनके पास आकर बैठे ।

गोनू झा ने खाते हुए ही कहा -"आज एक बात और समझ में आ गई कि जन का महत्त्व कम है और धन का महत्त्व ज्यादा। आदमी गुजर जाता है लेकिन धन बना रहता है इसलिए धन की सुरक्षा जरूरी लगती है।" यह सुनकर तीनों सकते में आ गए और गोनू झा चैन से भोजन करने लगे । गोनू झा की शरण में दरबारी (कहानी) गोनू झा अपने वाक्चातुर्य से सबका दिल जीत लेते थे। महाराज उनकी प्रतिभा के कायल थे।

कठिन से कठिन अवसर पर गोनू झा का सुझाव उन्हें जंचता और वे उसे आजमाते । उलझनें सुलझ जातीं । प्रायः मिथिला नरेश भरे दरबार में गोनू झा के सुझावों की सराहना करते । समय-समय पर गोनू झा को पुरस्कृत भी करते जिसके कारण मिथिला दरबार के अधिकांश दरबारी उनसे चिढ़ते थे और ईर्ष्या वश उन्हें नीचा दिखाने का अवसर तलाशते रहते थे।

गोनू झा इस स्थिति से परिचित थे मगर इन बातों पर वे ध्यान नहीं देते थे कि उन्हें कौन क्या कहता है । मस्त रहना उनके स्वभाव में शामिल था । मिथिला नरेश के दरबार में एक बार एक बहेलिया एक तोता लेकर आया जो समय के अनुसार उचित बातें बोल सकता था । जैसे सवेरा होने पर तोता गाता – 'सूरज निकला पूरब ओर, जागो भइया हो गई भोर।' किसी आगंतुक की आहट पर वह पूछता-'कौन हो भाई ? कहाँ से आए हो ? थोड़ी प्रतीक्षा करो।

स्वामी विश्राम कर रहे हैं ।' किसी के प्रस्थान करने पर बोलता-'अच्छा लगा आपसे मिलकर। फिर आइएगा । शुभ विदा ।' मिथिला नरेश को जब बहेलिए ने तोता दिखलाया तो उन्होंने उसे एक साधारण तोता समझा लेकिन बहेलिया द्वारा चुटकी बजाए जाने पर तोते ने कहा-“महाराज की जय हो ! हम आपकी सेवा में समर्पित हैं । आदेश करें महाराज!" महाराज तोता की मुग्धकारी आवाज सुनकर चकित हुए।

उन्होंने बहेलिए से पूछा, ” यह और क्या बोलता है ?" बहेलिए के कुछ पूछने से पहले ही तोते ने जवाब दिया -"बहुत कुछ महाराज !" महाराज को तोता पसन्द आया । बहेलिए ने महाराज को बताया कि समय के अनुसार स्थिति भाँपकर यह तोता लगभग सौ तरह के वाक्य बोल सकता है । महाराज ने बहेलिए को तोते की मुंहमांगी कीमत देकर विदा किया । महाराज के लिए यह तोता अद्भुत था ।

बड़े जतन से सिखाया-पढ़ाया गया यह तोता दरबार के लिए शोभा बन गया । महाराज ने उसके लिए अपने सिंहासन के पास ही एक मेज लगवा ली । जब महाराज दरबार में आते तो उनके साथ यह तोता भी पिंजड़े में लाया जाता । जब महाराज महल में जाते तो उनके साथ तोते का पिंजरा भी ले जाया जाता । समय गुजरता गया और महाराज का इस तोते के साथ लगाव भी बढ़ता गया ।

दूसरे राज्यों से यदि कोई विशेष अतिथि महाराज से मिलने आता तो महाराज अपने तोते की कौतुक पैदा करनेवाली पंक्तियों से उसे चमत्कृत करने में गौरव महसूस करते । एक दिन की बात है । महाराज को अचानक किसी कार्यवश दरबार से उठकर कहीं जाना पड़ा । जाते समय महाराज ने दरबारियों को निर्देश दिया कि वे तोते का खयाल रखें तथा चेतावनी भी दी कि तोते के साथ यदि कोई छेड़छाड़ हुई तो किसी की खैर नहीं ।

संयोग था कि उस समय तक दरबार में गोनू झा नहीं आए थे। महाराज के जाने के बाद गोनू झा दरबार में आए तो पाया कि सभी दरबारी मुँह लटकाए बैठे हैं । महाराज दरबार में नहीं हैं तथा तोता पिंजरे में मरा पड़ा है । गोनू झा ने एक दरबारी से पूछा “महाराज कहाँ हं ? तोते की यह हालत किसने की ?" दरबारी ने उन्हें बताया “महाराज अचानक किसी काम से उठकर कहीं गए हैं तथा वे जाते -जाते यह कह गए थे कि तोते का खयाल रखना ।

महाराज ने यह चेतावनी भी दी थी कि तोते के साथ किसी ने छेड़छाड़ की तो उसकी खैर नहीं । सभी दरबारी अपने आसनों पर बैठे महाराज के आने की प्रतीक्षा करते रहे । इस बीच न जाने किधर से एक संकरा साँप पिंजरे से लिपट गया । तोता के टें -टें से हम लोगों का ध्यान उधर गया । हम लोग कुछ कर पाते इससे पहले ही साँप ने तोते को डंस लिया ।" पूरी कहानी सुनने के बाद गोनू झा गम्भीर मुद्रा में अपने आसन पर जाकर बैठ गए ।

गोनू झा को चुप देखकर कुछ दरबारी उनके पास आए तथा उनसे पूछने लगे कि अब क्या होगा ? महाराज जब पूछेंगे कि तोता कैसे मरा?... इतने दरबारी एक तोता का ध्यान नहीं रख पाए... तब हम लोग क्या जवाब देंगे? गोनू झा ने उनसे कहा- “आप लोग विद्वान हैं, मैं आपको जवाब सुझाऊँ, यह मुझे शोभा नहीं देता।" दरबारियों ने उनका कटाक्ष भाँप लिया ।

फिर भी उनमें से कुछ ऐसे दरबारी गोनू झा के आसन के निकट आ गए जो वाकई गोनू झा के वाक्चातुर्य के प्रशंसक थे ।

उन लोगों के आग्रह पर गोनू झा ने कहा -" ठीक है, तोते की मृत्यु की सूचना मैं अपने ढंग से महाराज को दे दूंगा लेकिन आप सभी वही करेंगे जो मैं कहूँगा, तब तो यह जिम्मा मैं ले लूँगा और यदि आपमें से एक भी आदमी मेरी बात से सहमत नहीं हो तो तब मैं इस मामले में नहीं पडूंगा ।" सभी दरबारी एक स्वर में बोले – “पंडित जी !

आप जो भी निर्देश दें, उसका पालन हम लोग करेंगे।" तब गोनू झा ने कहा” सबसे पहले तोते का पिंजरा आप दरबार से बाहर ले जाकर रख दीजिए। महाराज जब पिंजड़े के बारे में पूछेंगे तो आप में से हर आदमी केवल यही कहेगा कि पिंजड़ा बाहर है। जब महाराज किसी को पिंजरा लाने के लिए कहें तो वह बाहर चला जाए मगर वापस नहीं आए।" सभी ने गोनू झा का यह निर्देश मानने की स्वीकृति दे दी और बोले-" बस पंडित जी, आप जैसा कहें हम करेंगे।

हम आपकी शरण में हैं । महाराज के क्रोध से बचाने का बस आप ही कोई उपाय कर सकते हैं ।" जब महाराज दरबार में वापस आए तो पाया कि तोते का पिंजड़ा वहाँ नहीं है। उन्होंने दरबारियों से उसके बारे में पूछा तो जवाब मिला -" बाहर है ।" महाराज ने पूछा-" क्यों बाहर है, जाइए, उसे लेकर आइए।" उन्होंने एक दरबारी को इशारा किया । दरबारी उठा बाहर चला गया । मगर लौटा नहीं।

एक के बाद एक दरबारी भेजे गए मगर उनमें से कोई वापस नहीं आया । राजा तोते के लिए बेचैन थे। अन्ततः उन्होंने गोनू झा से कहा-“क्या बात है ? क्या तोता मर गया ?" गोनू झा ने कहा-“महाराज! मैं यह कैसे कह सकता हूँ? छोटा मुँह बड़ी बात होगी।" " चलिए पंडित जी ! हम स्वयं देखते हैं, " मिथिला नरेश ने गोनू झा से कहा । गोनू झा तत्परता से उठे और महाराज के साथ चल पड़े ।

दरबार से बाहर निकलने पर महाराज ने दाएँ- बाएँ सिर घुमाकर तोते के पिंजड़े की खोज की तो उन्हें पास में ही रखा गया पिंजड़ा दिख गया । पिंजडे में तोता लुढ़का हुआ पड़ा था । उसे देखते ही महाराज विस्मित भाव में बोल पड़े– “अरे, यह तो सचमुच ही मर गया है! " गोनू झा ने कहा “जब आप बोल रहे हैं महाराज, तो सच ही होगा।” महाराज समझ गए कि तोते की मौत की खबर दरबारी उनके डर के कारण ही उन्हें नहीं दे पाए ।

उन्होंने दरबार में जाकर शेष रह गए दरबारियों से कहा -"तोते के मरने का मुझे बहुत दुःख है मगर मैं जानता हूँ कि इस तोते की मौत का कारण आप में से कोई नहीं है इसलिए बिना किसी भय के आप मुझे बताएँ कि तोते को क्या हो गया अचानक कि वह मर गया ।" तब एक दरबारी ने डरते- डरते तोते को साँप के काटने की घटना बताई जिसे सुनने के कुछ देर बाद ही महाराज सिंहासन से उठ खड़े हुए और उस दिन दरबार स्थगित कर दिया गया और महाराज महल की ओर चले गए ।

यह पहला मौका था जब गोनू झा दरबार से निकल रहे थे तो राजदरबार के सभी दरबारी उनके आस- पास, या पीछे-पीछे चल रहे थे तथा उनकी सराहना कर रहे थे । गोनू झा की चाल में अलमस्ती बढ़ गई थी ।

‹ अपनों का सचस्वर्ग से वापसी ›

ये कहानियाँ भी पढ़ें