धान का चढ़ावा
📚 गोनू झा की कहानियाँ
“ईश्वर सर्वव्यापी है लेकिन वह मनुष्य के कर्म में हस्तक्षेप नहीं करता । उसे मनुष्य के भाव, मनुष्य की आस्था से ही सरोकार है...यह मन्नत और चढ़ावा की बातें मेरी समझ से परे हैं ।" गोनू झा अपने दरवाजे पर गाँव के बड़े- बुजुर्गों को समझा रहे थे। दरअसल मिथिलांचल में उस वर्ष धान की फसल अच्छी हुई थी । खेतों में धान नहीं, सोने की बालियाँ मचल रही थीं ।
गोनू झा के गाँव में ही सोने-सी चमकती धान की बालियों ने ग्रामीणों को मंत्रमुग्ध कर रखा था । गाँववाले इसे ईश्वर की कृपा मान रहे थे। उन्हें लग रहा था कि भगवान गाँववालों पर प्रसन्न है जिसके कारण उनके गाँव में धान की फसल बहुत अच्छी हुई है । गाँववाले एकजुट होकर धनकटनी के समय अच्छी फसल के लिए उत्सव मनाना चाहते थे ।
धान की अच्छी फसल के लिए सर्वप्रथम वे भगवान से फसल की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से मन्नत माँगना चाहते थे। प्रायः प्रत्येक ग्रामीण ने भगवान को अच्छी फसल देने के लिए कुछ न कुछ चढ़ावा चढ़ाने की मन्नत माँगी थी ।
कौन भगवान को क्या चढ़ाएगा, किसके घर से भगवान के लिए क्या चढ़ावा आएगा, इसकी एक सूची तैयार कर ली गई थी मगर इस सूची में गोनू झा का नाम नहीं था इसलिए गाँव के बड़े- बुजुर्गों का एक जत्था उनके पास आया हुआ था यह कहने के लिए कि वे भी अपना नाम इस सूची में दर्ज करा लें तथा वे भगवान को क्या चढ़ावा चढ़ाएंगे यह लिखा दें । मगर गोनू झा तो गोनू झा थे।
वे इन बुजुर्गों की बात मानने को तैयार नहीं थे और वे ग्रामीणों को कर्मयोग की शिक्षा देने में लगे हुए थे।... गोनू झा अपनी बात कहे जा रहे थे “देखिए ! आप सभी बड़े हैं मेरे लिए पिता समान है ! मैं आप लोगों की हर बात मानने के लिए तैयार हूँ मगर यह चढ़ावा और मन्नत वाली बात रहने दीजिए । वैसे भी पूजा और चढ़ावा तो आस्था की बात है । आपकी आस्था है आप चढ़ाएँ।
लेकिन इसके लिए मुझे तो क्या, किसी और को भी बाध्य नहीं करें ।" बुजुर्गों में से एक ने गोनू झा पर फब्ती कसी-“का हो गोनू! नास्तिक हो गए हो क्या ...?" गोनू झा ने कहा “कौन कहता है कि मैं नास्तिक हूँ? मुझे ईश्वर में आस्था है। मैं तो इन कर्मकांडों में विश्वास नहीं करता जिसके लिए आप लोग कह रहे हैं । अभी यह आवश्यक नहीं है कि आप चढ़ावा के लिए सोचें या फसल की रक्षा के लिए मन्नत माँगे ।
आवश्यक यह है कि आप सभी अपने-अपने खेतों की रखवाली करें ताकि कोई जानवर इन तैयार फसलों को नुकसान नहीं पहुँचाए।” मगर ग्रामीणों का दवाब गोनू झा पर बना रहा और उनसे पिंड छुड़ाने के लिए गोनू झा ने उनसे कहा-“ठीक है!
जब आप लोगों का यही खयाल है कि मुझे कोई चढ़ावा चढ़ाना चाहिए तो मैं एक छईंटा (बाँस की टोकरी) धान चढ़ावा के रूप में चढ़ाने के लिए तैयार हूँ मगर शर्त यह है कि एक पथिया धान हो ।" उनकी बात सुनकर ग्रामीण खुश हो गए और उन्होंने समझ लिया कि आज उन्होंने गोनू झा की अकड़ ढीली कर दी । वे प्रसन्न होकर अपने-अपने घरों की ओर लौट गए। उनके जाने के बाद गोनू झा ने भी तय कर लिया कि उन्हें इन ग्रामीणों को सबक सिखाना है ।
उन्होंने अपने घर में धान रखने के लिए एक बहुत बड़ी कोठी बनवाई जिसके उपरी भाग का मुँह एक पथिया के बराबर था । उन्होंने एक पथिया का पेंदा कटवाकर कोठी के मुँह पर लगा दिया, जिससे लगे कि वहाँ पथिया ही है-कोठी नहीं । अन्ततः कटनी शुरू हुई । धान टोकरों में भरकर घरों तक पहुँचने लगे । गोनू झा ने भी अपनी कोठी में अपने खेत का धान सरकाना शुरू किया । गाँववालों को गोनू झा के चढ़ावे की याद आई।
ग्रामीणों का जत्था गोनू झा के पास पहुँचा। ग्रामीण देखना चाह रहे थे कि गोनू झा चढ़ावा के लिए धान निकालते भी हैं या नहीं । गोनू झा ने ग्रामीणों को देखते ही उनके आने का कारण समझ लिया और धान से भरे टोकरे को उठाकर पथिया में पलटते हुए कहा-“क्या करें भाई... ई पथिया भर ही नहीं रहा है। सुबह से कोशिश कर रहा हूँ। धान पथिया में जाते ही बिला जा रहा है... यह देखिए अन्तिम टोकरा है धान का आप लोगों के सामने ।
यह देखिए, पथिया में डाला धान और देखिए, धान बिला गया ।" ग्रामीणों ने देखा । हालाँकि वे कोठी की सच्चाई नहीं समझ पाए मगर इतना समझ गए कि गोनू झा से पार पाना उनके बस की बात नहीं है सो वे अपना- सा मुँह लेकर वापस लौट गए । इधर गोनू झा कोठी के ऊपर से पथिया निकालकर कोठी का मुँह उसके ढक्कन से बन्द करने में लग गए। गोनू झा हुए पराजित (कहानी) बसुआ यानी बासुदेव ।
गोनू झा के टहल -टिकोला में लगा रहने वाला उनके गाँव का एक किशोर। बसुआ, जिसका अपना सगा कोई नहीं था । गाँव में उसकी एक छोटी-सी झोंपड़ी थी । गोनू झा के खेत के पास । बसुआ दिन भर इधर-उधर रहता। किसी ने कुछ करने को कहा, कर दिया । अलमस्त था बसुआ । न दिन की फिक्र, न रात की चिन्ता । जब थक जाता तो चला आता अपनी झोंपड़ी में ।
उसे झोंपड़ी कहने की बजाय उसका रैन बसेरा कहें तो ज्यादा ठीक होगा-बसुआ मस्त-मलंग की तरह पड़ा रहता । 'न उधो का देना, न माधो का लेना !' निश्चिन्त रहता बसुआ। किसी की उसे परवाह नहीं थी । न कोई छोटा- मोटा, न कोई बड़ा । उसकी नजर में सब बराबर ! कोई बच्चा भी उसे किसी काम के लिए कहता तो वह 'जी मालिक' कहकर उसका काम कर देता । कहीं से दो जून रोटी मिल गई तो खा लिया और चला आया अपनी झोंपड़ी में ।
यही थी बसुआ की दिनचर्या। एक दिन गोनू झा का हरवाहा बीमार पड़ गया । गोनू झा को अपना खेत तैयार करना था । वे सोचने लगे-अब क्या करें ! अचानक खेत की मुँडेर पर उन्हें बसुआ दिख गया । वे खुश हो गए । उन्हें लगा कि बसुआ उनका कहना नहीं टालेगा। इसलिए उन्होंने बसुआ को आवाज दी-“बसुआ-ओ बसुआ !" बसुआ ने उनकी आवाज सुनी तो वहीं से चिल्लाया -"पाँव लागन मालिक!" और दौड़ता हुआ गोनू झा के पास पहुंच गया ।
गोनू झा ने कहा-“बसुआ, दो-चार दिन तू मेरा खेत जोत दे! हरवाहा बीमार पड़ गया है । वह ठीक हो जाएगा तब तक भले ही किसी और काम में लग जाना!" बसुआ मान गया । गोनू झा के घर से हल और बैल ले आया और खेत की जोताई में लग गया । गोनू झा दरबार के लिए तैयार होकर अपने खेत की ओर से ही दरबार के लिए निकले । उन्होंने देखा, बसुआ तन्मयता के साथ खेत जोतने में लगा हुआ है।
मन ही मन खुश होते हुए गोनू झा ने बसुआ को आवाज दी-“ओ बसुआ ! जरा इधर आ !" बसुआ खेत के बीच से ही चिल्लाया-“आया मालिक !” और दौड़ता हुआ गोनू झा के पास पहुँचा और हाँफते हुए पूछा-“जी, मालिक?” गोनू झा ने बसुआ से कहा “देख बसुआ !... मन लगा के खेत जोतना ! अपना काम समझ के जितना कर सको, करना।
शाम को दरबार से लौट- कर तुम्हें हलवा खिलाऊँगा!" बसुआ खुश हो गया और बोला-“जी, मालिक!" इसके बाद गोनू झा दरबार चले गए और बसुआ पूरे उमंग के साथ खेत जोतने में लग गया । जब थोड़ी थकान होती, बसुआ गाने लगता-“मालिक आएँगे! हलवा लाएँगे ! मैं तो जी भर के हलुआ खाऊँगा... मस्त होके सोने जाऊँगा...!" दरबार से लौटते समय भी गोनू झा खेत वाली राह से ही आए। उन्होंने देखा, बसुआ खेत जोतने में जुटा हुआ है ।
उन्हें देखकर आश्चर्य हुआ कि जितना खेत उनका हरवाहा सात दिनों में जोतता, उससे कहीं अधिक खेत बसुआ एक दिन में ही जोत चुका था ...। गोनू झा घर लौटे । वे अपने साथ बाजार से ही थोड़ा हलवा खरीदकर खेत की ओर आए थे । खेत पहुँचकर उन्होंने बसुआ को आवाज दी-“ओ बसुआ! आ ! बहुत हो गया ! अब कल जोतना! चला आ ! हाथ -मुँह धो ले । थक गया होगा । तुम्हें भूख भी लगी होगी ।
जल्दी आ ...मैं तुम्हारे लिए हलवा ले के आया हूँ।" बसुआ ने दूर से ही देखा गोनू झा के हाथों में बड़ा सा बर्तन देखकर वह बहुत खुश हुआ और कुएँ पर पहुँचकर हाथ-पाँव धोया, कुल्ला -गरारी किया और झूमते हुए गोनू झा की ओर चला-गाते-गाते-“जी भर के हलुवा खाऊँगा! तब मैं सोने जाऊँगा...!" जब वह गोनू झा के पास पहुँचा तब तक गोनू झा ने उसकी ओर वह बर्तन बढ़ा दिया जो उनके हाथ में था ।
बर्तन जैसे ही बसुआ ने पकड़ा तो उसके वजन से ही बसुआ को लगा कि बर्तन खाली है । बसुआ ने जब बर्तन में झाँका तो उसका सारा उत्साह फीका पड़ गया और उसके मुँह से निकला-“यह क्या मालिक ! आपने तो मुझसे कहा था कि आप मुझे हलवा खिलाएँगे, मगर ...।" गोनू झा ने बसुआ को बीच में ही टोकते हुए कहा-” हलुवा ही तो है..." बसुआ ने कहा-“मगर मालिक! इतना ही ?
इससे मेरा पेट कहाँ भरेगा ?" गोनू झा ने कहा" देखो, मैंने तुझे कहा था कि हलवा खिलाऊँगा तो हलवा ले आया तुम्हारे लिए...मैंने यह तो नहीं कहा था कि भर पेट हलवा खिलाऊँगा ? अब ज्यादा बक-बक मत कर । जो है सो खा ले।” बसुआ ने रुआँसा होकर गोनू झा की ओर देखा और कहा-“जी, मालिक।” बसुआ ने हलवा खा लिया और कुएँ पर जाकर पानी पिया फिर बर्तन धोकर गोनू झा को लौटा दिया ।
गोनू झा बर्तन लेकर जब घर की ओर लौटने लगे तब उन्होंने बसुआ से कहा-“कल मैं घर से सीधे दरबार चला जाऊँगा। शाम को जब दरबार से लौटूंगा तब तुम्हारे लिए कुछ मजेदार चटपटी चीजें लेता आऊँगा-जी भर के खाना ! हाँ, देख, सुबह से खेत जोतने में जरूर लग जाना !” बसुआ ने कहा-“जी, मालिक!" गोनू झा चले गए । बसुआ हल-बैल लेकर बथान पर पहुँचा आया । फिर अपनी झोंपड़ी में पहुँचा । उसके पेट में चूहे दौड़ रहे थे।
खलबली मची हुई थी । लोटा भर पानी पीकर किसी तरह बसुआ ने रात बिताई । रात को ही उसने सोच लिया था कि गोनू झा को वह जरूर मजा चखाएगा । दूसरी तरफ, गोनू झा बसुआ के काम से खुश थे। उन्होंने सोचा-बेचारा बसुआ! दिन भर काम में जुटा रहा... उम्मीद से ज्यादा खेत जोत दिया लेकिन उसे आज अधपेटा रहना पड़ गया । खैर !
कल उसके लिए कचौड़ी -जलेबी लेकर आऊँगा... इतना कि उसका पेट भर जाए!" दूसरे दिन शाम को खेत पर जब गोनू झा हाथ में कचौड़ी, जलेबी से भरा बर्तन लेकर पहुँचे तो देखा, बसुआ एक ही जगह हल-बैल चलाए जा रहा है । दिन भर में वह कट्ठा भर जमीन भर नहीं जोत पाया है । हाँ, जितनी जमीन जोता है उतनी जमीन की मिट्टी चूड़ होकर पाउडर की तरह महीन हो चुकी है ।
गोनू झा को कुछ समझ में नहीं आया कि बसुआ एक ही जगह हल क्यों चलाए जा रहा है ? उन्होंने क्रोध में आवाज दी -" ओए बसुआ, इधर आ !" बसुआ उनकी ओर देखा और चिल्लाकर बोला-“आया मालिक!" बसुआ हल-बैल छोड़कर गोनू झा के पास आने से पहले कुएँ पर गया और हाथ- पैर धोकर गोनू झा के पास पहुँचा और बोला-“लाइए मालिक, मजेदार और चटपटी चीजें ! भूख लगी है खा तो लूँ!” गोनू झा ने हाथ का बर्तन बसुआ की ओर बढ़ा दिया ।
बसुआ बर्तन में जलेबी -कचौड़ी देखकर बहुत खुश हुआ और वहीं पालथी मारकर बैठ गया और खाने लगा । गोनू झा उसे खाता देखकर मन ही मन खीज रहे थे। जब बसुआ खा चुका और बर्तन धोकर उन्हें थमाने लगा तब गोनू झा ने बर्तन लेते हुए बसुआ से पूछा-“बसुआ ! आज दिन भर में तू कट्ठा भर जमीन भी नहीं जोत पाया ! ऐसे ही जोताई होती है ?" बसुआ ने गोनू झा की आवाज से उत्पन्न आवेश को महसूस किया और तड़ककर बोला" मालिक !
आप नाराज क्यों होते हैं ? मैंने तो कहा था, खेत जोतूँगा सो जोत रहा था । मैंने यह थोड़े ही कहा था कि सारा खेत जोत दूँगा ?" गोनू झा को तुरन्त हलवा वाली बात याद आ गई, और उनका आवेश जाता रहा । बसुआ ने उन्हें अहसास करा दिया था कि दूसरों को गच्चा देने वाले को खुद भी गच्चा खाना पड़ सकता है। बसुआ की मस्त-मलंग आवाज से गोनू झा हँस दिए और बोले" बसुआ ... सच में तुम बहुत अच्छे इन्सान हो ।
कल मुझसे गलती हो गई थी, अब ऐसा कभी नहीं होगा मैं सदैव इस बात का ध्यान रखूँगा !" बसुआ हँस दिया मस्त हँसी और हल -बैल लेकर बथान की ओर चल पड़ा । गोनू झा उसे मस्त चाल में जाते हुए देखते रहे ।
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स्रोत/लेखक: गोनू झा की कहानियाँ