नाई के पाँचवें भाई अलनसचर की कहानी
📚 अलिफ़ लैला (अरबी रातें)
नाई ने कहा कि मेरे पाँचवें भाई का नाम अलनसचर था। वह बड़ा आलसी और निकम्मा था। वह रोज किसी न किसी मित्र के पास जा कर बेशर्मी से कुछ भीख माँग लेता और खा-पी कर पड़ा रहता। मेरा बाप कुछ समय बाद बूढ़ा हो कर मर गया। उसने तीन हजार एक सौ पचास रुपए छोड़े। इन रुपयों को हम सातों भाइयों ने बराबर-बराबर बाँट लिया। अलनसचर ने भी अपना भाग पाया और उससे कुछ व्यापार करने की सोची।
उसने साढ़े चार सौ रुपए के शीशे के बरतन खरीदे और उन्हें टोकरी में रख कर बाजार में सड़क के किनारे बैठ गया। वहीं एक दरजी की दुकान थी। दो-एक दिन में दरजी से उसकी दोस्ती हो गई। अलनसचर वाचाल और मूर्ख तो था ही, हवाई किले भी बनाता रहता था। एक दिन वह दरजी से कहने लगा, मैं इन साढ़े चार सौ के बरतनों को नौ सौ में बेचूँगा और फिर उससे और बरतन लूँगा जिन्हें अठारह सौ में बेचूँगा।
इसी तरह व्यापार करते-करते मेरे पास तीस हजार रुपए हो जाएँगे। फिर मैं बहुमूल्य व्यापार सामग्री माणिक, मोती आदि खरीदूँगा और उनसे काफी मुनाफा कमाऊँगा। जब मेरे पास काफी रुपया हो जाएगा तो मैं एक विशाल भवन खरीद कर दास-दासियाँ भी मोल लूँगा और रईसों की तरह रहूँगा और मेरी प्रसिद्धि सारे नगर में हो जाएगी, मेरे यहाँ बड़े-बड़े गवैये और कलावंत आएँगे और मेरे यहाँ रात-दिन रास-रंग होंगे। मेरा व्यापार भी जारी रहेगा।
जब बढ़ते-बढ़ते मेरा धन पाँच लाख तक पहुँच जाएगा तो मैं यहाँ के मंत्री के पास संदेश भेजूँगा कि अपनी बेटी का विवाह मुझ से कर दे। उसने स्वीकार किया तो ठीक वरना मैं उसकी बेटी को जबर्दस्ती उठा लाऊँगा। फिर जब मंत्री की पुत्री से मेरा विवाह हो जाएगा तो मैं दस गुलाम खरीदूँगा और शहजादों जैसे बढ़िया कपड़े पहनूँगा और रत्नजटित जीन लगामवाले असील घोड़े पर चढ़ कर शान से मंत्री के घर जाऊँगा।
जब मैं उसके महल में पहुँचूँगा तो सभी छोटे-बड़े लोग भय और आदरपूर्वक मुझे देखेंगे और मेरा पूर्ण सत्कार करते हुए मुझे अंदर ले जाएँगे। जब मैं ऊपर जाना चाहूँगा तो मेरे नौकर और गुलाम और नौकरों के जमादार अदब से जीने में दोनों और खड़े होंगे। वजीर अपना दामाद समझ कर मुझे अपने आसन पर बैठने की जगह देगा और स्वयं मेरे सामने बैठेगा। मैं अपने सेवकों से हजार-हजार अशर्फियों के दो तोड़े लाने को कहूँगा।
मैं एक तोड़ा वजीर को दूँगा कि यह तुम्हारी बेटी का महर है और दूसरा अपनी इच्छा से तुम्हें देता हूँ। मेरी उदारता की चर्चा चारों ओर होने लगेगी। फिर मैं वैसे ही ठाठ-बाट से अपने घर आऊँगा।
मेरी पत्नी, जिसका मुख पूर्णमासी के चंद्रमा की तरह होगा, बड़ी सज-धज के साथ सोलह श्रृंगार कर के मेरे सामने आएगी तो मैं गर्व के मारे उसकी ओर आँख भी नहीं उठाऊँगा, फिर उसकी प्रधान सेविकाएँ और सखी-सहेलियाँ मेरे सामने आ कर विनय करेंगी कि मालिक, आपकी पत्नी, जो आपकी दासी के समान है, आप की आज्ञा की प्रतीक्षा में है और आप के सामने खड़ी है। कृपा कर के उसे अपने आगे बैठ जाने को कहें।
मैं फिर भी उन्हें कोई उत्तर नहीं दूँगा। उन्हें इस बात का बड़ा आश्चर्य होगा कि मैं उनकी ओर और अपनी पत्नी की ओर देखता क्यों नहीं हूँ। वे लोग बड़ी देर तक मेरे सामने खड़ी हो कर मुझ से अपनी पत्नी पर ध्यान देने के लिए अनुनय करती रहेंगी। फिर मैं एक कृपापूर्ण दृष्टि अपनी पत्नी पर डालूँगा लेकिन फिर निगाह फेर लूँगा।
मेरे इस रवैये से मेरी पत्नी की सेविकाएँ और साथिनें समझेंगी कि मैं वैसे किसी बात पर नाराज नहीं हूँ किंतु पत्नी का जो साज-श्रृंगार किया गया है वह मेरे मन का नहीं है इसलिए वे उसे दूसरे कक्ष में ले जाएँगी ताकि उसका नए सिरे से साज-श्रृंगार करें। इतने समय में मैं भी उठ कर नए कपड़े पहन लूँगा। शयनकक्ष में जाने पर भी मैं अपनी पत्नी से पूर्ण उपेक्षा का बरताव करूँगा।
मैं उसकी ओर एक दृष्टि भी नहीं डालूँगा और उससे एक बात भी नहीं करूँगा। मैं पलंग पर उसकी और पीठ कर के सो रहूँगा। मेरी पत्नी रात भर इस उपेक्षा से दुखी हो कर आँसू बहाती रहेगी और सवेरा होने पर अपनी माता यानी मंत्री की पत्नी से रो-रो कर कहेगी कि मेरे पति ने रात में मेरे साथ गर्व और उपेक्षा का बर्ताव किया।
उसकी माँ उसे दिलासा देगी, फिर मेरे महल में आ कर सम्मानपूर्वक मेरा हाथ चूमेगी और कहेगी कि जमाई राजा, मेरी बेटी पर इतना अत्याचार न करो कि उसकी ओर देखना ही छोड़ दो। उसका अगर कोई कसूर है तो बताओ मैं उसे दंड दूँगी। वैसे यह तो कहने की जरूरत नहीं कि वह तुम्हारी दासी है और तब मन से तुम्हारी सेवा करना उसका कर्तव्य है। तुम उस पर एक बार तो कृपा दृष्टि करो। उसके इस अनुनय-विनय का मुझ पर कोई असर नहीं होगा।
फिर मेरी सास मेरे पास आ कर मेरा पाँव चूमेगी। मैं इस पर भी टस से मस नहीं हूँगा। फिर मेरी सास शराब का एक प्याला भर कर मेरी पत्नी को देगी कि अपने पति को पिला दो, शायद इससे वह तुम से प्रसन्न हो जाए। मेरी पत्नी मेरे सामने आ कर प्याला लिए बहुत देर तक भयभीत-सी खड़ी रहेगी। फिर वह कहेगी कि आपको उसी भगवान की सौगंध है जिसने आप को इतना ऊँचा बनाया है, कि इस दासी के हाथ से मद्यपात्र ले कर पियें।
मैं उसकी इस बात को बदतमीजी समझूँगा और उसके मुँह पर एक तमाचा लगाऊँगा और उठ कर उसके इतने जोर से लात मारूँगा कि वह दालान से नीचे गिर पड़ेगी। मेरा भाई अपनी कल्पना में इतना खो गया कि उसे अपनी स्थिति का भी ध्यान नहीं रहा। उसने उठ कर उसी टोकरे पर, जिसमें उसके शीशे के बरतन रखे हुए थे, जोर की लात जमाई। टोकरा सड़क पर जा गिरा और उसमें के सारे बरतन टूट-फूट कर बिखर गए।
दरजी, जो उसकी बकवास को मजे ले कर सुन रहा था, हँसते-हँसते लोट-पोट हो गया। उसने मेरे भाई से कहा, मूर्ख, अभागे, तुझे मालूम है कि तेरी यह हानि क्यों हुई है। तूने इतनी सम्मानित और सुंदर स्त्री का जो अपमान किया यह उसी का फल है। अगर मैं तेरे श्वसुर यानी मंत्री की जगह होता तो ऐसी बदतमीजी पर तेरे सौ कोड़े लगवाता और गधे पर बिठा कर सारे शहर में घुमाता कि लोग तुझे दंडित अपराधी के रूप में जान जाएँ।
मेरे भाई को भी अपने माल की बरबादी देख कर बड़ा दुख हुआ और वह रोने-चिल्लाने लगा। बहुत-से लोग उस समय जुमे की नमाज के लिए मस्जिद की ओर आ रहे थे। उसका रोना-पीटना सुन कर वहाँ भीड़ इकट्ठी हो गई। लोग पूछने लगे कि क्या बात है। जब दरजी ने उन लोगों को पूरा हाल बताया तो वे सब भी हँसने लगे और मेरे भाई का मजाक उड़ाने लगे।
संयोग से उसी समय एक अमीर घराने की स्त्री परदेवाली सवारी पर बैठी कहीं जा रही थी और उस स्थान से गुजर रही थी। उसने सवारी रुकवा कर भीड़ के लोगों से पूछा कि क्या बात है, कौन रो रहा है और उस पर क्या विपत्ति पड़ी है। उन लोगों ने जल्दी में पूरी बात नहीं बताई बल्कि कह दिया कि एक गरीब बरतनवाला एक चबूतरे पर टोकरे में बरतन रखे था, संयोग से ठोकर लगी और सारे बरतन जमीन पर गिर कर चूर-चूर हो गए।
उस स्त्री को दया आई। उसने अपने एक सेवक को अशर्फियों की एक थैली दे कर कहा कि उस बेचारे गरीब को दे आओ जिसका नुकसान हुआ है। सेवक ने वह थैली, जिसमें पाँच सौ अशर्फियाँ थीं, मेरे भाई अलनसचर को दी। उसने थैली पा कर बड़ी प्रसन्नता व्यक्त की और उस दानी स्त्री को बहुत-से आशीर्वाद दे कर थैली ले कर अपने घर चला आया। कुछ ही देर में उसका दरवाजा किसी ने खटखटाया। उसने दरवाजा खोला तो देखा कि एक बुढ़िया खड़ी है।
बुढ़िया ने कहा, बेटा, नमाज का समय हो गया है। मुझे एक लोटा पानी दो तो मैं वजू कर के नमाज पढ़ लूँ। मेरे भाई ने देखा कि वह काफी बूढ़ी है इसलिए नितांत अपरिचित होने पर भी उसने उसे ला कर पानी दिया। बुढ़िया नमाज पढ़ कर मेरे भाई के सामने आई और उसके सामने ऐसे झुकी जैसे नमाज में भगवान के समक्ष झुकते हैं और फिर उठ कर उसे बराबर आशीर्वाद देती रही। मेरे भाई ने उसके फटे कपड़े देख कर समझा कि यह भीख माँग रही है।
उसने अशर्फियों की थैली निकाली और उसे दो अशर्फियाँ देने लगा। बुढ़िया ने वे अशर्फियाँ नहीं लीं। मेरे भाई अलनसचर ने बिगड़ कर पूछा कि क्या तू इतनी भीख से भी संतुष्ट नहीं है। बुढ़िया ने कहा कि तुमने गलत समझा कि मैं भिखारिन हूँ। मैं तो अति धनवान और सुंदर युवती की नौकरानी हूँ, वह मुझे बहुत कुछ देती है और मुझे भीख की जरूरत नहीं है।
मेरा भाई मूर्ख तो था ही, उस बुढ़िया के फरेब को न समझा और उससे कहने लगा कि हमें भी अपनी मालकिन को दिखाओ। इसके लिए वह उसे इनाम देने लगा। बुढ़िया हँस कर बोली, तुम यह इनाम रख लो और मेरे साथ चलो। तुम मेरी मालकिन को तो देखोगे ही, यह भी संभव है कि तुम्हारी सुंदरता देख कर वह तुमसे विवाह कर ले। ऐसा हुआ तो तुम वास्तव में भाग्यशाली हो जाओगे, असंख्य धन और अनिंद्य सुंदरी के स्वामी।
मेरे भाई ने अंदर जा कर अच्छे वस्त्र पहने और अशर्फियों की थैली ले कर बुढ़िया के साथ चला। बुढ़िया उसे एक बड़े विशाल और सजे-सजाए मकान के सामने ले गई। उसके आवाज देने पर एक यूनानी दासी ने द्वार खोला। बुढ़िया ने उसे एक सुसज्जित स्थान पर बिठाया और अंदर गई। कुछ ही देर में एक अत्यंत रूपवती युवती आ कर उसके समीप बैठ गई और उससे घुल-मिल कर बातें करने लगी। उसने कहा, यह ऊपरी कपड़े उतार कर आराम से बैठो।
अलनसचर ने ऐसा ही किया। कुछ ही देर में वह युवती घर के अंदर यह कह कर चली गई कि मैं अभी आती हूँ। कुछ ही देर में एक बड़ा लंबा-चौड़ा हब्शी हाथ में नंगी तलवार ले कर आया और गरज कर मेरे भाई से बोला, तू यहाँ मेरे घर में क्या कर रहा है? मेरे भाई की भय के मारे घिग्घी बँध गई। हब्शी ने उसे तलवार के कई हाथ मारे जिससे वह गिर कर बेहोश हो गया। हब्शी ने उसकी कमर से अशर्फियों की थैली खोल ली और आवाज दी कि नमक लाओ।
वही यूनानी दासी एक कटोरे में पिसा हुआ नमक ले आई। नमक वह यह देखने के लिए मँगाता था कि उसका शिकार अगर मरा न हो तो वह उसे फिर तलवार मार कर खत्म कर दे। दोनों ने उसके घावों पर नमक छिड़का। मेरा भाई उनका उद्देश्य समझ गया था इसलिए तकलीफ सह कर भी चुप हो कर पड़ा रहा। हब्शी और दासी उसे पूर्ण मृत जान कर थैली ले कर चले गए।
कुछ देर में बुढ़िया फिर आई और मेरे भाई को घसीटती हुई ले गई और एक कोने में बने हुए गढ़े में फेंक आई जहाँ और भी कई लाशें पड़ी हुईं थीं। मेरा भाई इस अरसे में तकलीफ की वजह से बेहोश हो गया था। गढ़े में फेंके जाने के कुछ देर बाद उसे होश आया। वास्तविकता यह थी कि तकलीफ देने के लिए डाला गया नमक ही उसके प्राण बचाने और शक्ति देने का कारण बना।
थोड़ी देर के बाद वह उस गढ़े से निकल कर एक कोने में दब कर बैठा फिर छुपता-छुपाता मकान के दरवाजे पर पहुँचा। जो कुछ कहीं पड़ा मिलता खा-पी लेता। दो दिन बाद बुढ़िया फिर नए शिकार की तलाश में निकली तो यह मौका पा कर भाग निकला और मेरे पास आ गया और मुझसे अपनी सारी विपत्तियों का हाल कहा। महीने भर में उसके सारे घाव भर गए और वह पूर्णतः स्वस्थ हो गया। अब उसने बदला लेने की योजना बनाई।
उसने एक बड़ी-सी थैली बनाई और उसमें अशर्फियों के बराबर शीशे के टुकड़े भर दिए। फिर उसने बुढ़ियों जैसे कपड़े पहने और कपड़ों के अंदर तलवार छुपा कर हाथ में थैली ले कर निकल पड़ा। संयोग से एक गली में वही धोखेबाज बुढ़िया मिल गई। उसने बूढ़ी स्त्रियों के जैसे स्वर में उससे कहा, बहन, मैं फारस देश की रहनेवाली हूँ और इस नगर में नई आई हूँ। मेरे पास पास सौ अशर्फियाँ हैं।
मैं चाहती हूँ कि उन्हें परख और तौल कर देख लूँ कि पूरी और ठीक हैं या नहीं। तुम कहीं से मेरे लिए सिक्के तौलने का तराजू ला दो। उसने उत्तर दिया, बहन, तुम मेरे साथ चली आओ। मुझ से अधिक विश्वसनीय व्यक्ति इस नगर में कोई नहीं है। मेरा पुत्र सर्राफे का काम करता है। वह तुम्हारी अशर्फियाँ भली भाँति तौल और परख देगा। लेकिन जल्दी करो, ऐसा न हो कि वह घर से अपनी दुकान को चला जाए।
वह पापिन मेरे भाई को उसी घर में ले गई जिसमें पहले ले गई थी। यूनानी दासी ने पहले की भाँति द्वार खोला और मेरे भाई को अंदर ले जा कर एक अच्छी जगह बिठा दिया। बुढ़िया ने कहा, तुम यहीं बैठो, मैं अभी अपने बेटे को ले कर आती हूँ। कुछ ही देर में उसका तथाकथित पुत्र यानी वही हत्यारा हब्शी आया और कहने लगा कि भाई, मेरे साथ चलो। मेरा भाई अलनसचर बुढ़िया के वेश में उसके पीछे चल दिया।
रास्ते में जब वह हब्शी लापरवाह हो गया तो मेरे भाई ने तलवार निकाल कर ऐसा हाथ मारा कि उसका सिर कट कर अलग जा पड़ा। अलनसचर ने उसका सिर और धड़ दोनों खींच कर उसी गढ़े में डाल दिए। इतने में यूनानी दासी बरतन में पिसा नमक ले कर आई किंतु बुढ़ियों के वस्त्र पहने नंगी तलवार लिए पुरुष को देख बरतन फेंक कर भागने लगी। मेरे भाई ने झपट कर उसे पकड़ा और उसका सिर काट दिया।
दौड़-भाग और चीख-पुकार सुन कर वह बुढ़िया भी वहाँ आ गई। लेकिन वहाँ का हाल देख कर जान बचाकर भागने लगी। मेरे भाई ने दौड़ कर उसे पकड़ा और कहा, दुष्टा, कुकर्मिणी, तूने मुझे पहचाना या नहीं। बुढ़िया काँपती हुई बोली कि मैंने तुम्हें कभी नहीं देखा, पहचानूँगी कैसे। मेरा भाई बोला, तूने देखा कैसे नहीं है, मैं वही हँ जिससे तूने उस गली में नमाज के लिए पानी माँगा था और फिर यहाँ ला कर अपनी समझ में मरवा डाला है।
बुढ़िया हाथ जोड़ कर और गिड़गिड़ा कर कहने लगी कि मेरा अपराध क्षमा कर दो। किंतु मेरे भाई ने उस पर दया न की और उसके भी चार टुकड़े कर दिए। अब मेरे भाई ने उस सुंदर युवती की तलाश की जिससे उसने पहले प्रेमालाप किया था। वह एक अन्य कक्ष में मिली और मेरे भाई को देख कर काँपने लगी।
मेरे भाई ने उसे निरपराध जान कर उससे कोई कटु वाक्य न कहा बल्कि सांत्वना दी और पूछा, सुंदरी, मैंने उन दोनों बदमाश स्त्रियों और हब्शी का अंत कर दिया है। अब तुम बताओ कि तुम कौन हो, कहाँ की रहनेवाली हो और इन अत्याचारियों के फंदे में कैसे फँस गई। उसने उत्तर दिया, मैं एक धनी व्यापारी की पत्नी थी। यह बुढ़िया कभी-कभी मेरे घर आती थी लेकिन मुझे यह नहीं मालूम था कि यह कौन है और क्या करती है।
एक दिन इसने आ कर मुझ से कहा कि मेरे घर विवाह है, तुम उसमें शामिल होने के लिए चलो। इसके बहुत अनुनय-विनय करने पर मैं इसके साथ उत्तम-उत्तम वस्त्राभूषण पहन कर और सौ अशर्फियाँ ले कर यहाँ आ गई। यहाँ से इन लोगों ने मुझे अपने घर न जाने दिया और इसी हब्शी के साथ सहवास के लिए मजबूर किया। तीन वर्ष से मैं यहीं रहती हूँ।
इस हब्शी से और इन लोगों के कुकृत्यों में विवशतापूर्वक शामिल होने से मैं बड़ी दुखी थी किंतु कुछ कर नहीं पाती थी। मेरे भाई ने पूछा कि इन लोगों ने भोले-भाले लोगों को मार कर कितना धन जमा किया है। उसने कहा कि धन तो इतना है कि तुम सारी आयु आराम से रह सकते हो। यह कह कर वह उसे कई कमरों में ले गई जहाँ पर कई संदूक मुद्राओं आदि से भरे थे। मेरे भाई की यह देख कर आँखें फट गईं।
उस स्त्री ने उससे कहा कि तुम बाहर जा कर कुछ मजदूर ले आओ तो हम लोग यह सब यहाँ से उठा कर ले चलें। मेरा भाई बाहर जा कर बाजार की तरफ दौड़ गया और कई मजदूर ले कर आ गया किंतु उसे देख कर आश्चर्य हुआ कि इतनी देर में वह स्त्री संदूकों के समेत गायब हो गई, केवल एक कोने में अनुमानतः पाँच सौ अशर्फियों के मूल्य का सामान पड़ा हुआ था।
मेरे भाई ने सोचा कि चलो, जो कुछ हाथ आया वही बहुत है और मजदूरों से वही सामान उठवा कर अपने घर आ गया। दुर्भाग्य से मजदूरों को लाने के बाद उसने उस घर का दरवाजा बंद नहीं किया था, न बाहर जाने पर घर को ताला लगाया। अतएव आसपास के लोग वहाँ आ गए और मजदूरों को सामान उठाए हुए जाते देख कर और घर को खाली पा कर काजी के यहाँ चले गए और उससे सारा मामला बता दिया।
मेरा भाई अपने घर में एक रात निश्चिंत हो कर सो रहा था कि कई सिपाही आए और उसे पकड़ कर काजी के पास ले गए। काजी ने उससे पूछा कि यह सामान कहाँ मिला। उसने कहा कि मैं ये सारी बातें सच-सच आपको बताऊँगा किंतु आप यह आश्वासन दें कि मुझे दंड न दिया जाएगा। काजी ने कहा, सच बोलने पर मैं तुझे दंड न दूँगा। अतएव मेरे भाई ने सारी घटनाएँ उसे आद्योपांत बता दीं।
काजी ने अपने सेवकों को भेज कर मेरे भाई के घर से सारा सामान उठवा मँगाया और उसे अपने घर भिजवा दिया और उसमें से मेरे भाई को कुछ भी नहीं दिया। इसके बाद उसने मेरे भाई अलनसचर को दो-तीन वर्ष के लिए नगर से निष्कासित कर दिया ताकि वह खलीफा के पास जा कर उससे काजी की शिकायत न कर सके।
मेरा भाई बेचारा उन दो-चार अशर्फियों को ले कर, जो उसकी जेब में पड़ी थीं, शहर से बाहर निकला और एक ओर को चल दिया किंतु दुर्भाग्य ने यहाँ भी उसे धर दबाया। दो-तीन दिन बाद उसे डाकुओं ने घेर लिया। वे उसका सारा धन, यहाँ तक कि पहनने के कपड़े भी, लूट कर ले गए। मुझे मालूम हुआ तो मैं कुछ कपड़े और रुपए ले कर अपने भाई की खोज में निकला और कुछ दिनों बाद उसे खोज निकाला।
उसे वस्त्र और रुपए दे कर मैं उसे छुपा कर नगर में ले आया और अपने घर में ला कर रखा। इसके बाद मैं बराबर उसका भरण-पोषण करता रहा था। नाई के छठे भाई कबक की कहानी जिसके होंठ खरगोश की तरह के थे नाई ने कहा कि अब मेरे आखिरी भाई शाह कबक का वृत्तांत रह गया है। इसे भी सुन लीजिए, फिर मैं आप से विदा लूँ।
इस भाई का नाम शाह कबक था और उसके होंठ खरगोश की तरह ऊपर को चढ़े हुए थे और वह चलता भी खरगोश की तरह कूद-कूद कर था। पिता के मरने पर उसे अपने हिस्से के रुपए मिले और उसने उनसे व्यापार किया जिससे उसे काफी मुनाफा हुआ किंतु कुछ दिनों बाद दुर्भाग्य से उसे ऐसा घाटा हुआ कि दाने-दाने को मुहताज हो गया। मतलब यह कि उसके पास बहुत ही कम धन रह गया।
अब उसने यह धंधा शुरू किया कि अमीरों के घर जाता और द्वारपालों से साठ-गाँठ करता और उन्हें घूस देता। वे उसे अंदर जाने देते जहाँ वह गृहस्वामी के पाँव पकड़ कर उससे भीख माँगता। द्वारपाल भी कहते कि बेचारा वास्तव में अत्यंत दुखी है, इसे जरूर कुछ दे दीजिए। एक दिन घूमते-घूमते वह एक विशाल भवन के सामने गया जहाँ बहुत-से नौकर- चाकर दौड़-भाग कर रहे थे। उसने एक सेवक से पूछा कि यह किसका मकान है।
उसने कहा, मालूम होता है तू परदेसी है तभी इस महल के स्वामी का नाम पूछ रहा है। हमारा स्वामी तो सूर्य की भाँति प्रसिद्ध है। उसका नाम जाफर बरमकी है जो खलीफा का विश्वासपात्र मंत्री है। मेरे भाई ने उन सेवकों से पूछा कि क्या मुझे यहाँ कुछ भिक्षा मिल सकती है। उन्होंने कहा कि हमारा स्वामी अति दयालु है, वह किसी याचक को नहीं रोकता, तुम बेखटक अंदर चले जाओ और हमारे मालिक से भीख माँगो, वह तुम्हें निहाल कर देगा।
मेरा भाई अंदर गया तो वहाँ का ऐश्वर्य देख कर उसकी आँखें फट गईं। महल बहुत बड़ा था और अत्यंत मूल्यवान वस्तुओं से सजा हुआ था। उसमें शानदार संगमरमर का फर्श था और हर जगह रंगीन रेशमी परदे लटक रहे थे। कई दालानों और वाटिकाओं से होता हुआ मेरा भाई एक दालान में पहुँचा जहाँ बहुत-से नौकर-चाकर थे और एक वृद्ध पुरुष एक सोने के कामवाली गद्दी पर बैठा था। मेरा भाई समझ गया कि यही बरमकी है।
उसने प्रणाम किया तो बरमकी बोला, क्या चाहते हो? मेरे भाई ने उसे झुक कर सलाम किया और कहा, सरकार मैं निर्धन मनुष्य हूँ और आप जैसे ऐश्वर्यवान व्यक्ति से कुछ माँगने आया हूँ। बरमकी इस बात से खुश हुआ और उसकी दीन-हीन दशा देख कर बोला कि आश्चर्य है कि हमारे बगदाद शहर में भी कोई ऐसा निर्धन व्यक्ति है। मेरा भाई यह समझा कि यह मुझे बहुत कुछ देगा और उसने बरमकी को बहुत आशीर्वाद दिया।
बरमकी ने उससे कहा कि मैं तुम्हें ऐसा दान दूँगा जिसे तुम जीवन भर याद रखोगे। फिर मेरा भाई बोला कि मैं सौगंधपूर्वक कहता हूँ कि मैंने अभी तक कुछ नहीं खाया है। बरमकी बोला, यह तो बड़े दुख की बात है कि तुम अत्यंत भूखे भी हो। मैं तुम्हारे लिए अभी भोजन मँगवाता हूँ। यह कह कर बरमकी ने जोर से आवाज दी, छोकरे, हाथ धोने के लिए पानी ला।
न कोई छोकरा आया न पानी किंतु बरमकी अपने हाथ ऐसे मल-मल कर धोने लगा जैसे कि उन पर कोई पानी डाल रहा हो। उसने मेरे भाई से कहा कि तुम भी आगे आओ और हाथ धोओ। मेरे भाई ने सोचा कि बरमकी परिहास-प्रिय है। वह भी आगे बढ़ कर झूठ-मूठ हाथ धोने लगा। फिर बरमकी बोला कि अभी भोजन भी आ रहा है। कुछ क्षणों के बाद वह अपने मुँह तक हाथ ले गया और ऐसे मुँह चलाने लगा जैसे ग्रास को चबा रहा है। उसने मेरे भाई से कहा कि तुम भी खाओ।
संकोच क्यों कर रहे हो। इस घर को अपना ही समझो। मेरा भाई, जो वास्तव में भूखा था, इस झूठ-मूठ की दावत से कुढ़ कर रह गया और कुछ न बोला। बरमकी ने कहा, क्या बात है? क्या तुम्हें यह शीरमाल और यह कबाब अच्छे नहीं लगते? तुम खा क्यों नहीं रहे हो? मेरे भाई ने कुछ और उपाय न देख कर बरमकी की भाँति ही झूठ-मूठ खाना शुरू कर दिया।
कुछ देर बाद बरमकी ने पुकार कर कहा, सच कहो तुमने ऐसा स्वादिष्ट चकोर और बटेर का मांस कभी खाया है। फिर इसी प्रकार उसने झूठ-मूठ बतख का मांस खाया और खिलाया। फिर बरमकी बोला कि देखो यह मुर्गे का कैसा स्वादिष्ट मांस है, एक टाँग और एक बाजू तुम भी लो। फिर कहा, देखो यह बकरी के बच्चे का भुना मांस है। उसे भी उसने झूठ-मूठ खाया और खिलाया। इसी प्रकार कई प्रकार के कल्पित व्यंजन उसने मँगाए और झूठ-मूठ खाए और खिलाए।
फिर एक व्यंजन का एक ग्रास ले कर मेरे भाई के मुँह की ओर ले गया और कहा कि इसे मेरे हाथ से खाओ। शाह कबक ने उस झूठे ग्रास को चबाया और कहा, वास्तव में इसका स्वाद अद्वितीय है। बरमकी बोला कि मैं पहले ही कहता था कि तुम इसे पसंद करोगे, अच्छा अब एक और चीज खा कर देखो। यह कह कर वह फिर एक हवाई ग्रास शाह कबक के मुँह की ओर ले गया।
शाह कबक ने यूँ ही मुँह चला कर कहा, वाह, इसके स्वाद का क्या कहना, यह भी पिछले व्यंजन से कम नहीं है। इसमें से अंबर, लौंग, जायफल और जावित्री सब की सुगंध आ रही थी और कोई सुगंध किसी दूसरी सुगंध को दबा नहीं रही है। बरमकी बोला कि जी भर कर इसे खाओ। फिर बरमकी ने छोकरे को (जो कहीं उपस्थित नहीं था) आवाज दी कि खाने के बरतन उठा ले और फल ला। फिर मेरे भाई से कहा कि यह बादाम आज ही तोड़े गए हैं।
इसके बाद वे दोनों काल्पनिक रूप से बादामों को तोड़ कर उनका छिलका फेंक कर गूदा खाने लगे। इसी प्रकार और भी भाँति-भाँति के मेवों और फलों को बरमकी ने झूठ-मूठ खाया खिलाया। शाह कबक ने खूब तारीफ की और कहा कि बहुत ही स्वादिष्ट चीजें खाने को मिलीं जिनसे मुँह थक गया लेकिन मन न भरा। अब बरमकी ने मुस्कुरा कर उसकी ओर हाथ बढ़ाया और कहा कि यह मदिरा पियो।
शाह कबक ने कहा कि हमारे परिवार में मदिरापान वर्जित है किंतु बरमकी बराबर जोर देता रहा तो उसने झूठ-मूठ का प्याला अपने गले में उड़ेल लिया और कहा, मालिक, मैंने सुना था कि शराब में नशा होता है, मुझे तो बिल्कुल नशा नहीं चढ़ा। बरमकी ने कहा कि अब मैं तुम्हें एक नए प्रकार की तेज शराब पिलाता हूँ। यह कह कर उसने एक काल्पनिक प्याला मेरे भाई की ओर बढ़ाया।
उसने उसे झूठ-मूठ पी लिया और मद्यप की तरह चेष्टाएँ करने लगा। कुछ देर में उसने बरमकी को एक घूँसा मारा, फिर एक और घूँसा मारा। तीसरी बार बरमकी ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा कि तू पागल हो गया है क्या? मेरे भाई ने ऐसा हाव-भाव दिखाया जैसे नशे से चौंका हो। फिर वह हाथ जोड़ कर बोला, सरकार, मुझ से बड़ा अपराध हुआ। आप ने मुझे इतने सुस्वादु व्यंजन खिलाए और मैंने आप के साथ ऐसी धृष्टता की।
किंतु आपने मुझे तेज शराब भी पिला दी। मैंने आपसे पहले ही निवेदन किया था कि मेरे परिवार में मद्यपान नहीं होता है और मुझे इसकी आदत नहीं है। इसी के नशे में मुझ से भूल हुई। मुझे क्षमा करें। बरमकी यह सुन कर क्रुद्ध होने के बजाय हँस पड़ा और बोला, मुझे बहुत दिनों से तेरे जैसे मनुष्य की ही तलाश थी। मैं तेरा अपराध इस शर्त पर क्षमा कर सकता हूँ कि तू यहीं हमेशा मेरे साथ रह।
अभी तक हम लोगों ने झूठ-मूठ का भोजन किया है, अब सचमुच का करेंगे। यह कह कर उसने सेवकों को आज्ञा दी और वे सब एक-एक कर के वहीं व्यंजन लाए जिन्हें अब तक बरमकी ने झूठमूठ खाया और खिलाया था। मेरे भाई ने रुचिपूर्वक वे स्वादिष्ट व्यंजन पेट भर खाए। फिर बरतन उठाए गए और उत्तम मदिरा के पात्र लाए गए। मद्यपान के बीच ही कई रूपसी नवयुवतियाँ आईं और उन्होंने सुरीले वाद्यों के साथ मधुर स्वर में देर तक गाना-बजाना किया।
मेरा भाई इन सब बातों से स्वभावतः ही बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने बरमकी की उदारता की बड़ी प्रशंसा की और उसे बहुत आशीर्वाद दिया। बरमकी ने कहा कि अब तुम यह फटे-पुराने कपड़े उतारो और कायदे के कपड़े पहनो। यह कह कर उसने सेवकों को आज्ञा दी कि इसके लिए नए कपड़े लाओ। वे बरमकी के अपने वस्त्रागार से बहुमूल्य वस्त्र शाह कबक के लिए ले आए।
बरमकी ने मेरे भाई को हर तरह से बुद्धिमान और व्यवहार-कुशल पाया और अपने घर का सारा प्रबंध उसके सुपुर्द कर दिया। इस प्रकार वह बड़ा संतुष्ट और प्रसन्न हो कर बरमकी के महल में रहने लगा। किंतु उसके इस सौभागय ने बहुत दिनों तक उसका साथ न दिया। खलीफा ने बरमकी के मरने पर उसकी सारी संपत्ति और धन जब्त कर लिया। मेरे भाई ने जो संपत्ति अर्जित की थी वह भी उससे छीन ली गई।
वह बेचारा अपना थोड़ा-बहुत बचा हुआ रुपया ले कर व्यापारियों के एक दल के साथ विदेश को चला कि कुछ व्यापार करें। किंतु रास्ते में डाकुओं ने उन सब व्यापारियों पर हमला कर के उन्हें लूट लिया और उन्हें गुलाम बना कर बेच दिया। मेरा भाई भी एक जंगली आदमी के हाथ बेच दिया गया। वह जंगली उसे मारा-पीटा करता और कहता कि मुझे इतने रुपए दे तो तुझे आजाद कर दूँगा। मेरे भाई ने कसम खा कर कहा कि मेरे पास एक पैसा भी नहीं है।
इस पर उस जंगली ने छुरी निकाल कर मेरे भाई के होंठ चीर डाले। इस पर भी उस पर दया न की और होंठ ठीक हो जाने के बाद उसे कठिन परिश्रम के काम पर लगा दिया गया। बेचारा इसी तरह दुख में जीवन बिताने लगा। उस जंगली की पत्नी बड़ी सुंदर थी। वह जब लूट-मार करने जाता था तो अपनी पत्नी की रक्षा का भार मेरे भाई पर छोड़ जाता था।
पति के जाने के बाद वह स्त्री शाह कबक से बड़ी मीठी-मीठी बातें करती, उसकी हर जरूरत का ध्यान रखती और बड़े आकर्षक हाव-भाव दिखाती। शाह कबक समझ गया कि यह मुझे चाहती है और मेरे साथ भोग की इच्छुक है। किंतु अपने जंगली मालिक के डर से शाह कबक उससे अलग ही रहता और जब एकांत में वह उसे आकर्षक हाव-भाव दिखाती तो आँखें नीचे कर लेता।
एक दिन प्रेमावेश में वह स्त्री पति की उपस्थिति ही में शाह कबक के सामने ऐसी चेष्टाएँ करने लगी। जंगली ने उसे शाह कबक की शरारत समझा और क्रोध में आ कर एक ऊँट पर अपने पीछे उसे बिठाया और एक ऊँचे पहाड़ पर ले जा कर उसे छोड़ दिया ताकि वह भूख-प्यास से मर जाए। वह स्वयं अकेला ऊँट पर बैठ कर नीचे उतर आया। कुछ दिनों में उधर से कुछ लोग बगदाद की तरफ आते हुए निकले।
वे स्वयं तो मेरे भाई को न लाए किंतु बगदाद आ कर मुझे उसका हाल बता दिया। मैंने जा कर उसे सांत्वना दी और उसे अपने घर ले आया। नाई ने कहा कि यह सब कथाएँ सुन कर खलीफा बहुत हँसा। उसने मुझे अच्छा इनाम दिया और गंभीर व्यक्ति का खिताब दिया। लेकिन कहा कि तुम बगदाद से निकल जाओ। कुछ वर्षों बाद मैंने सुना कि खलीफा का देहांत हो गया है इसलिए अपने घर वापस आया। उस समय तक मेरे छहों भाई भी मर गए थे।
इसके बाद कई वर्ष तक मैंने इस लँगड़े और उसके बाप की सेवा की जैसा कि आप लोगों ने स्वयं ही इसके मुँह से सुना है। फिर भी यह अत्यंत दुख की बात है कि इनकी इतनी भलाई करने पर भी इसने कृतघ्नता का सबूत दिया और मुझसे घृणा करता रहा। इसके शहर से निकलने पर इसे ढूँढ़ता हुआ मैं काशगर पहुँचा।
दरजी ने काशगर के बादशाह के सामने नाई के मुख से सुना वृत्तांत सुना कर कहा कि नाई की कहानी के बाद सब लोगों ने भोजन किया और तीसरे पहर मैं अपनी दुकान पर गया। शाम को घर आने लगा तो देखा कि यह कुबड़ा शराब में धुत्त हो कर मेरी दुकान के सामने बैठा गा-बजा रहा है। मैं उसे अपने घर ले गया। मेरी पत्नी ने उस दिन मछली पकाई थी। हम दोनों के खाने के लिए वह कई मछलियाँ लाई। मैंने कुबड़े को कुछ मछलियाँ खाने को दीं।
वह मूर्ख उनके काँटे निकाले बगैर ही उन्हें खा गया। काँटे उसके गले में अटक गए और वह बेहोश हो कर गिर पड़ा। मैंने उसे ठीक करने के बहुत- से प्रयत्न किए किंतु जब वह मर गया तो मैं उसे यहूदी हकीम के दरवाजे से टिका कर घर लौट आया। दरजी ने फिर कहा, जहाँपनाह, इसके बाद की सारी बातें आप को ज्ञात हैं। हकीम ने उसे मरा जान कर व्यापारी के गोदाम में गिरा दिया।
व्यापारी ने उसे चोर समझ कर उसको थप्पड़ लगाए और समझा कि यह उसी मार से मर गया है अतएव इसे बाजार में एक दुकान के सहारे खड़ा कर दिया। मैंने सारी बातें सच-सच आप को बता दीं। अब आप को अधिकार है चाहे मुझे मृत्युदंड दें या क्षमादान करें। बादशाह दरजी की बात सुन कर संतुष्ट हो गया और बोला कि दरजी और बाकी तीनों लोग निर्दोष हैं, उन्हें छोड़ दिया जाए।
उसने यह भी कहा कि मैं लँगड़े और नाई के छह भाइयों के किस्से सुन कर बहुत प्रसन्न हुआ, निस्संदेह यह कुबड़े की कहानियों से भी अधिक मनोरंजक हैं। लेकिन उसने आज्ञा दी कि उस नाई को, जो इसी शहर में है, यहाँ लाया जाए और जब तक वह यहाँ न आए न कुबड़े की लाश को दफन किया जाए और न किसी अभियुक्त को घर जाने दिया जाए।
अतएव बादशाह के आदेश से उसके नौकर-चाकर दरजी के साथ गए और कुछ देर में खोज कर के नाई को बादशाह के सामने ले आए। नाई की अवस्था नब्बे वर्ष की थी, उसकी दाढ़ी, मूँछें और भवें बर्फ की तरह सफेद थीं। उसकी नाक बहुत लंबी थी और उसके कान बुढ़ापे के कारण काफी लटक आए थे। बादशाह को उसका यह विचित्र रूप देख कर बरबस हँसी आ गई। उसने नाई से कहा, मैंने सुना है कि तुम बड़ी विचित्र और विस्मयकारी कहानियाँ कहते हो।
मैं चाहता हूँ कि तुम्हारी कुछ कहानियाँ तुम्हारे मुँह से सुनूँ। नाई ने हाथ जोड़ कर कहा, हे पृथ्वीनाथ, मैं आपका दासानुदास हूँ। मुझे जो भी आज्ञा होगी उसके पालन में मैं सदैव तत्पर हूँ। किंतु कहानियाँ सुनाने के पहले एक प्रश्न पूछने की धृष्टता करना चाहता हूँ। कृपया यह बताएँ कि यह दरजी, यह यहूदी हकीम और इतने सारे नागरिक यहाँ क्यों जमा हैं और यह कुबड़ा आदमी जमीन पर किस लिए लेटा है।
बादशाह ने कहा, तुझे इन बातों से क्या लेना-देना। नाई ने कहा, मैं सिर्फ यह साबित करना चाहिता हूँ कि मैं बकवासी नहीं हूँ। मैं बोलता हूँ तो सुनना भी चाहता हूँ। बादशाह उसकी यह बात सुन कर हँस पड़ा और उसने पूरी घटना बताई कि किस तरह कुबड़े की हत्या के अपराध पर चार आदमी फाँसी चढ़ाए जानेवाले थे।
नाई यह कथा सुनते समय गंभीरतापूर्वक सिर हिलाता रहा जैसे वह सब समझ रहा है और किसी ऐसे भेद को पा गया है जो वह अपने हृदय में छुपाए है। फिर उसने बादशाह से कुबड़े को देखने की अनुमति चाही। अनुमति मिलने पर वह उठ कर कुबड़े के पास गया और बहुत देर तक उसके शरीर का निरीक्षण करता रहा और नाड़ी, आँखें आदि देखता रहा। यकायक वह बड़े जोर से हँसा। वह हँसता ही रहा और हँसते-हँसते पीठ के बल गिर पड़ा।
उसे यह भी ध्यान न रहा कि बादशाह के सामने इस प्रकार हँसना बड़ी उद्दंडता है। उठने के बाद भी बहुत देर तक हँसता रहा। फिर बोला सरकार, इस कुबड़े की कहानी तो ऐसी है कि स्वर्णाक्षरों में लिखवा कर रखी जाए। लोग उसकी बात सुन कर आश्चर्यचकित हुए और कहने लगे कि या तो इस नाई का मस्तिष्क फिर गया है या बुढ़ापे के कारण इसकी मति मारी गई है।
बादशाह ने भी विनोदपूर्वक कहा, हे अल्पभाषी, बुद्धिसागर महोदय, आपको इतनी हँसी किस कारण आ रही है? नाई ने कहा, पृथ्वीपाल, मैं आपकी न्यायप्रियता और क्षमाशीलता की सौंगध खा कर कहता हूँ कि यह कुबड़ा मरा ही नहीं है। मैं इसे ठीक कर सकता हूँ। आप अनुमति दें तो मैं इसका इलाज करूँ। अगर मैं सफल न होऊँ तो फिर आप मुझे दुर्बुद्धि या विक्षिप्त जो भी चाहें ठहराएँ और जो दंड चाहें वह दें।
बादशाह से अनुमति पा कर नाई ने अपना संदूकचा खोला और उसमें से एक तेल निकाल कर कूबड़े के हाथ और गले पर कुछ देर तक मलता रहा। फिर उसने एक औजार से कुबड़े का मुँह खोला और एक चिमटी उसके मुँह के अंदर डाल कर उसके गले में अटका मछली का काँटा पकड़ा और जोर लगा कर उसे बाहर निकाल लिया। उसने काँटा सभी उपस्थित व्यक्तियों को दिखाया। कुछ ही देर में कुबड़े के हाथ-पैरों में हरकत हुई और उसने अपनी आँखें खोल दीं।
इसके अतिरिक्त भी उसके शरीर में जीवन के कई चिह्न दिखाई दिए। काशगर का बादशाह और सारे उपस्थित व्यक्ति इस बात को देख कर घोर आश्चर्य में पड़ गए कि एक पूरे दिन-रात मुर्दों के समान पड़े रहने के बाद भी कुबड़ा यकायक जी उठा। सभी लोगों को इस बात से खुशी हुई। बादशाह ने आज्ञा दी कि कुबड़े की तथाकथित मृत्यु की घटना और नाई की कही हुई कहानियाँ लिपिबद्ध की जाएँ और शाही ग्रंथागार में रखी जाएँ।
उसने यह भी आज्ञा दी कि चूँकि दरजी, यहूदी हकीम, मुसलमान व्यापारी और ईसाई को कुबड़े की वजह से बड़ा मानसिक और शारीरिक कष्ट सहना पड़ा है इसलिए इन लोगों को शाही खजाने से काफी इनाम दे कर विदा किया जाए। उसने तीसरी आज्ञा यह दी कि नाई का कुछ मासिक वेतन नियत कर के दरबार में रख लिया जाए ताकि वह अपनी कहानियों से हमारा मनोरंजन किया करे। मंत्री की बेटी शहरजाद इस संपूर्ण कथा को कहने के बाद चुप हो रही।
दुनियाजाद ने कहा, दीदी, यह तो बहुत अच्छी कहानी थी। मैंने तो समझा था कि बेचारा कुबड़ा मर ही गया होगा। वास्तव में नाई बहुत ही कुशल और बुद्धिमान था कि उसने उसे जीवनदान दे दिया। हिंदुस्तान के बादशाह शहरयार ने कहा, मैं भी इस कहानी को सुन कर, विशेषतः लँगड़े और नाई के वृत्तांतों को सुन कर अत्यंत प्रसन्न हूँ।
शहरजाद ने कहा, यदि बादशाह सलामत मुझे आज प्राणदान दें तो मैं बका के पुत्र अबुल हसन और खलीफा हारूँ रशीद की प्रेयसी शमसुन्निहार की कहानी सुनाऊँगी। यह कहानी कुबड़े की कहानी से भी अधिक मनोरंजक है। चुनांचे उस कहानी के सुनने की इच्छा के कारण बादशाह ने उस दिन भी शहरजाद का वध न करवाया। वह दिन भर दरबार में बैठ कर अपने राज्य प्रबंध में लगा रहा और रात को आ कर शहरजाद के साथ सो गया।
दूसरी सुबह होने के एक पहर पहले दुनियाजाद ने शहरजाद को जगा कर कहा कि अब वह कहानी सुनाओ जिसे सुनाने को कहा था। शहरयार भी जाग गया और कहानी सुनने को उत्सुक हो गया। शहरजाद ने कहना शुरू किया।
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स्रोत/लेखक: अलिफ़ लैला (अरबी रातें)